कोविड महामारी के बीच MSMEs को चलाने में NBFCs की भूमिका बढ़ी, जानिए कैसे

एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियां) भारत में MSMEs के लिए वरदान साबित हो रही हैं। ये आय-सृजन गतिविधियों में संलग्न और ग्रामीण व शहरी दोनों क्षेत्रों में आजीविका को प्रभावित करने वाले सूक्ष्म-उद्यमियों के लिए फाइनेंस के एक विश्वसनीय स्रोत के रूप में उभरी हैं।

Ankit KumarSun, 26 Sep 2021 12:48 PM (IST)
कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर ने भारतीय श्रम बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है।

नई दिल्ली, ओंड्रेज क्यूबिक। एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियां) भारत में MSMEs के लिए वरदान साबित हो रही हैं। ये आय-सृजन गतिविधियों में संलग्न और ग्रामीण व शहरी दोनों क्षेत्रों में आजीविका को प्रभावित करने वाले सूक्ष्म-उद्यमियों के लिए फाइनेंस के एक विश्वसनीय स्रोत के रूप में उभरी हैं। उद्योग की रिपोर्ट के अनुसार, माइक्रोफाइनेंस उद्योग का सकल ऋण पोर्टफोलियो (जीएलपी) 10.1% बढ़कर 31 दिसंबर, 2020 तक 2,32,648 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। दिसंबर 2019 के अंत में एनबीएफसी का सूक्ष्म-वित्त उद्योग के सकल ऋण पोर्टफोलियो (जीएलपी) में 9.06% हिस्सा था, जो 2,11,302 करोड़ रुपये था।

कोविड का प्रभाव

कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर ने भारतीय श्रम बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे लाखों नौकरियां खत्म हो गई हैं। इससे उन लोगों की संख्या में तेज वृद्धि हुई है, जो नौकरी छूटने के बावजूद सक्रिय रूप से रोजगार के अवसरों की तलाश नहीं कर रहे हैं। एक सतत आर्थिक संकट और नौकरी के कम अवसरों को देखते हुए इन बेरोजगार पुरुषों व महिलाओं के सामने अपने कौशल को अपने निजी व्यवसायों में बदलकर स्व-रोजगार वाले व्यक्ति के तौर पर काम पर लौटने की अधिक संभावना है। यह ग्लोबल ट्रेंड के अनुरूप है, जहां आर्थिक मंदी ने सूक्ष्म उद्यमिता के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की है।

MSMEs के सामने आने वाली वित्तीय चुनौतियां

माना जाता है कि सूक्ष्म उद्यमों का अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है और यह सच भी है। यह क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 30% का योगदान देता है और इसमें अधिक रोजगार देने, आय सृजन की गतिविधियों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर संपन्नता लाने के साथ-साथ और अधिक व्यवसायों के लिए रास्ता खोलने की एक सहज क्षमता है।

अनुमानों के अनुसार, भारत में एमएसएमई 3 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं और अगले कुछ वर्षों में इनमें 5 से 6 करोड़ रोजगार सृजित करने की क्षमता है। यह बात अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अध्ययन से और भी पुष्ट हो जाती है, जिसमें पाया गया है कि भारत जैसे विकासशील देश में कुल रोजगार का 70 प्रतिशत हिस्सा सूक्ष्म उद्यमों में है। इस लिहाज से सूक्ष्म उद्यम रोजगार के सबसे अहम घटक हैं।

सूक्ष्म-उद्यमों से अर्थव्यवस्था को होने वाले लाभों के बावजूद औपचारिक वित्तीय क्षेत्र की तरफ से उनके लिए सीमित वित्तीय विकल्प उपलब्ध हैं। इस तरह के उद्यमों से जुड़े हाई रिस्क, भारत के बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ते एनपीए संकट, कठोर ऋण शर्तों और हमारे औपचारिक वित्तीय क्षेत्र को जकड़े हुए कुछ व्यवस्थागत मुद्दों के कारण यह स्थिति है।

इसलिए एनबीएफसी पर इन चुनौतियों को दूर करने और अपने सूक्ष्म उद्यम को शुरू करने व विकसित करने के लिए सामने आ रहे उद्यमियों की नई पीढ़ी को पर्याप्त वित्तीय सहायता प्रदान की जिम्मेदारी है। कम आय वाले समूहों को छोटे कोलेटरल-फ्री लोन देने में विशेषज्ञता वाली एनबीएफसी को महामारी की चपेट में आए सूक्ष्म उद्यमों की मदद के लिए कदम बढ़ाना चाहिए और मौजूदा कर्जदारों का सहयोग करते हुए उनकी स्थिरता सुनिश्चित करनी चाहिए, जो अपना बकाया वापस करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मजबूत बुनियाद

कुछ हालिया असफलताओं के बावजूद भारत में एनबीएफसी की बुनियाद काफी मजबूत है। एनबीएफसी ने कोविड -19 के कारण आई अनिश्चितता के बावजूद आजीविका और आय में सुधार के लिए सूक्ष्म उद्यमों को ऋण देना जारी रखा है। मौजूदा अनिश्चितता ने छोटे उद्यमियों की बकाया चुकाने की क्षमता को प्रभावित किया है।

कोविड के दौरान एनबीएफसी ने ऋण अनुशासन का कड़ाई से पालन किया है, ग्राहक से जुड़ाव बढ़ाया है और उचित व्यवहार के प्रति कर्मचारियों को संवेदनशील बनाया है ताकि कर्जदारों का भरोसा बहाल हो, क्रेडिट चक्र बरकरार रहे और ओवर-लेंडिंग से बचा जा सके। तेजी से टेक्नोलॉजी अपनाने से एनबीएफसी की परिचालन क्षमता में काफी सुधार हुआ है, जिससे इवेंट-बेस्ड डिसरप्शंस को कम करने, पोर्टफोलियो बिहेवियर का अनुमान लगाने, रिस्क मॉडल तैयार करने और ग्राहक-केंद्रित प्रोडक्ट डिजाइन करने में भी मदद मिली है।

इसके अतिरिक्त, एनबीएफसी को रिजर्व बैंक द्वारा किए गए लिक्विडिटी उपायों और बेहतर मार्केट फाइनेंसिंग स्थितियों से भी लाभ हुआ है, जिससे उन्हें पैसा जुटाने, कारोबार में निरंतरता बनाए रखने और महामारी के दौरान लचीलापन बनाए रखने में मदद मिली है। यह सब सरकार द्वारा संचालित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के इतर है जो एनबीएफसी से ऋण सुविधाओं का लाभ उठाने वाले कम आय वाले ग्रामीण और शहरी परिवारों के संकट को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

सूक्ष्म उद्यमियों की सहायता करना

एनबीएफसी लंबे समय से भारत में सूक्ष्म-लघु उद्यमों के लिए एक जीवन रेखा की तरह रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में एनबीएफसी ने ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों तथा निम्न-आय वाले परिवारों में सूक्ष्म-उद्यमियों की वित्तीय जरूरतों और औपचारिक वित्तीय क्षेत्र के बीच की खाई को पाटने के लिए नई फाइनेंशियल सर्विसेज पेश की हैं। उद्यमियों के क्रेडिट रिस्क प्रोफाइल की जांच के लिए इनोवेटिव तरीकों से लैस एनबीएफसी कम कागजी कार्रवाई के साथ छोटे व्यवसायों को जल्दी और आकर्षक ब्याज दर पर कोलेटरल- फ्री उद्यमिता ऋण प्रदान करने में सक्षम हैं।

सूक्ष्म-उद्यमों की अनूठी चुनौतियों को दूर करने के लिए एनबीएफसी ने ओवरड्राफ्ट प्रोटेक्शन और व्यवसाय के नकदी प्रवाह के आधार पर कर्ज लेने व चुकाने के फ्लेक्सी बेनिफिट जैसी अनूठी खूबियों के साथ लोन तक उनकी पहुंच आसान की है। इसके साथ-साथ एनबीएफसी ने टियर-2, टियर-3 और टियर-4 मार्केट में अपना नेटवर्क व पहुंच बढ़ाने तथा 24 * 7 ग्राहकों को संतुष्टि देने के लिए डिजिटलाइजेशन को भी अपनाया है।

एनबीएफसी के पास सूक्ष्म उद्यमियों के सामने आने वाली समस्याओं की भी गहरी समझ है। इस दिशा में वे कर्जदारों के आत्मविश्वास को बढ़ाने और उन्हें व्यावसायिक गतिविधियों को संचालित करने व रोजगार के सतत अवसर के निर्माण में सक्षम बनाने के लिए विभिन्न कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम का भी आयोजन करती हैं।

निष्कर्ष

रोजगार सृजन और सतत विकास की अपनी उत्कृष्ट क्षमता के कारण सूक्ष्म उद्यम भारतीय अर्थव्यवस्था का वास्तविक ग्रोथ इंजन हैं और इनका समर्थन करने में एनबीएफसी की भूमिका पर पर्याप्त जोर नहीं दिया गया है। एनबीएफसी के नेतृत्व में श्रम प्रधान सूक्ष्म उद्यमों का पुनरुद्धार भारत की आर्थिक सुधार की आधारशिला बन सकता है। उन्हें अतीत से सीखे गए सबक का इस्तेमाल करना चाहिए और महामारी को सूक्ष्म उद्यमों के लिए नई संभावनाओं में बदलने की दिशा में काम करना चाहिए।

(लेखक होम क्रेडिट इंडिया के सीईओ हैं। प्रकाशित विचार लेखक के निजी हैं।)

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