नई तकनीक से मक्के की खेती कर किसान हो रहे मालामाल

कभी नकदी फसल के रूप में यहां के किसान गन्ने की खेती करते थे। लेकिन गन्ने के आपूर्ति में दिक्कत। गन्ना मूल्य के निर्धारण में सरकार की नाइंसाफी और भुगतान में चीनी मिल प्रबंधन की मनमानी से क्षुब्ध किसानों ने विकल्प के रूप में मक्के की खेती करना आरंभ किया है।

JagranThu, 29 Apr 2021 01:14 AM (IST)
नई तकनीक से मक्के की खेती कर किसान हो रहे मालामाल

बेतिया । कभी नकदी फसल के रूप में यहां के किसान गन्ने की खेती करते थे। लेकिन गन्ने के आपूर्ति में दिक्कत। गन्ना मूल्य के निर्धारण में सरकार की नाइंसाफी और भुगतान में चीनी मिल प्रबंधन की मनमानी से क्षुब्ध किसानों ने विकल्प के रूप में मक्के की खेती करना आरंभ किया है। नौतन प्रखंड के पकड़िया, जमुनिया, विशुनपुरा, बलुही, छौराहा आदि गांव के किसानों की मेहनत और कर्मठता के बदौलत इलाके में आर्थिक समृद्धि आई है। किसान मक्के की खेती कर न केवल खुद को आर्थिक रूप से समृद्ध बना रहे हैं, बल्कि मक्का उत्पादन के हब के रूप में इन गांवों की पहचान जिले में बनी है। गन्ने की खेती के लिए साहूकारों, बैंक व चीनी मिल के कर्ज में डूबे किसान अभी स्वयं की पूंजी से मक्के की खेती कर रहे हैं। कुल भूमि के आधे से अधिक क्षेत्रफल में मक्के की खेती हो रही है। रक्सौल, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर व पड़ोसी देश नेपाल के व्यापारी आकर यहां से मक्का खरीद कर ले जा रहे हैं। इस लिए किसानों को अपना उत्पाद बेचने के लिए भी बनिया एवं अन्य की चिरौरी नहीं करनी पड़ रही है। बताया जाता है कि एक एकड़ भूमि में 45 से 50 क्विटल मक्के का उत्पादन हो रहा उत्पादन हो रहा है। किसान को प्रति एकड़ 30 से 35 हजार रुपये की आमदनी हो रही है।

--------------------------------------------------------------- वर्ष में दो बार मक्के की खेती

पकड़िया गांव के किसान चंद्रमा सिंह ने बताया कि मक्के की फसल साल में दो बार लगाई जाती है। बड़े पैमाने पर इसकी खेती अक्टूबर से नवंबर में की जाती है। इसकी कटाई अप्रैल माह में हो जाती है। किसान प्रति एकड़ 45 से 50 क्विटल मक्के का उत्पादन ले रहे हैं। एक एकड़ खेत में उन्नतशील ढंग से मक्के की खेती करने में 15 से 20 हजार रुपये खर्च होता है। एक हजार से 1200 रुपये प्रति क्विटल के दर से मक्के की बिक्री आसानी से हो रही है। पांच माह में प्रति एकड़ 30 से 35 हजार रुपये की आमदनी किसान कर रहे हैं। बिशुनपुरा के किसान सत्येंद्र सिंह ने बताया कि जून और जुलाई में भी मक्के की खेती होती है। लेकिन उस वक्त पैदावार कम होता है। इस लिए कम हीं किसान उस वक्त मक्के की खेती करते हैं। धान की खेती करते हैं।इससे भूमि की उर्वराशक्ति भी बनी रहती है और अपना उत्पाद बेचने के लिए किसी की चिरौरी नहीं करनी पड़ती। ------------------------------------------------------------------

किसानों में मक्के की खेती को ले जागरूकता बलुही गांव के किसान चंदेश्वर प्रसाद ने बताया कि नकदी फसल के विकल्प के रूप में मक्के की खेती को लेकर किसानों में हाल के दिनों में काफी जागरूकता आई है। जमुनिया के आनंद कुमार का कहना है कि मक्का क्षेत्र के किसानों के लिए नकदी फसल बन गया है। जिससे लोगों की आर्थिक स्थिति समृद्ध होने लगी है। स्थिति यह है कि अगल बगल के गांव के लोग भी मक्के की खेती के प्रति जागरूक होने लगे हैं। मक्के की खेती से यहां के किसान घरेलू खर्च के साथ बच्चों की पढ़ाई लिखाई का खर्च भी आसानी से पूरा कर रहे हैं।

------------------------------------------- कोट किसान अपनी मेहनत के बल पर मक्के की खेती कर आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं। सरकार भी किसानों की आर्थिक समृद्धि के लिए कई तरह की योजनाएं चला रही हैं। नारायण प्रसाद

नौतन विधायक सह पर्यटन मंत्री,बिहार सरकार

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