रात के अंधेरे में डराती हैं गंडक की बलखाती धारा, तटबंध पर दिखती विकास की हकीकत

बगहा। भितहा के सेमरबारी मानपुर एवं भुईँधरवा पंचायत के लोग संचार क्रांति के इस युग में भी

JagranMon, 02 Aug 2021 12:15 AM (IST)
रात के अंधेरे में डराती हैं गंडक की बलखाती धारा, तटबंध पर दिखती विकास की हकीकत

बगहा। भितहा के सेमरबारी, मानपुर एवं भुईँधरवा पंचायत के लोग संचार क्रांति के इस युग में भी बरसात के चार महीने लालटेन की रोशनी में बांध पर गुजारते हैं। जब भी नेपाल के तराई क्षेत्र में अधिक वर्षा होती है, गंडक नदी भितहां समेत गंडक पार के चार प्रखंडों में तांडव मचाना शुरू कर देती है। दियारा में बाढ़ का पानी फैलने से कई गांव के लोगों को तटबंध समेत अन्य ऊंचे स्थलों पर शरण लेना पड़ता है। गत दिनों गंडक बराज से तीन लाख क्यूसेक पानी छोड़े जाने के बाद प्रखंड की दो पंचायतें जलमग्न हो गईं। सेमरबारी पंचायत के वार्ड संख्या एक, तीन व चार तथा मानपुर के वार्ड संख्या एक, दो, तीन व चार करीब पांच दिनों तक जलमग्न रहे। कुछ यहीं हाल चारों प्रखंड भितहा, ठकराहां, मधुबनी एवं पिपरासी के अधिकांश गांवों का है। नदी के किनारे बसे इन गांवों की दिनचर्या नदी से ही शुरू और नदी से ही समाप्त होती है। इसके बावजूद आजतक इस समस्या के स्थायी समाधान की पहल नहीं हुई। जलस्तर में बढ़ोतरी पर बाढ़ व कमी पर कटाव का खतरा :

बरसात के चार महीने दियारावर्ती पंचायतों के लिए किसी बड़े इम्तेहान से कम नहीं है। यदि जलस्तर में बढ़ोतरी होती है तो बाढ़ की स्थिति बन जाती है जबकि जलस्तर में कमी होने पर नदी कटाव करने लगती है। सबसे खराब स्थिति चंदरपुर के समीप पिपरा-पिपरासी तटबंध पर दिखाई देती है। जहां कटाव शुरू होते ही अभियंताओं समेत ग्रामीणों की बेचैनी चरम पर पहुंच जाती है। बाढ़ का पानी प्रवेश करते ही लोग प्लास्टिक सीट तानकर परिवार समेत तटबंध पर गुजर बसर करने को विवश हो जाते हैं। जब गंडक नदी पर धनहा में गौतमबुद्धा सेतु का निर्माण हुआ तो उम्मीद जगी कि अब बाढ़ से निजात मिलेगी। लेकिन नदी का रुख अब भी दियारावर्ती पंचायतों की ओर ही है। 15 अगस्त 2017 को टूट गया था तटबंध :-

15 अगस्त 2017 को पिपरा - पिपरासी तटबंध भितहा के चंदरपुर के समीप टूट गया। सुबह नींद खुलने तक दर्जनों गांव जलमग्न हो गए। किसानों को व्यापक क्षति उठानी पड़ी। उस मंजर को आज भी लोग भूल नही पाए है। तटबंध के समीप रहने वाले लोगो को वह दिन याद आता है जब सुबह सुबह तटबंध टूटा तो अधिकांश लोग अभी बिस्तर से भी नहीं उठे थे। तब तक चीख पुकार शुरू हो गयी। इस कारण जब भी नदी का जलस्तर बढ़ता है, लोग ऊंचे स्थानों पर शरण ले लेते हैं। कहते हैं पीड़ित :-

इसराफिल अहमद बताते हैं कि बरसात के चार महीने तटबंध पर ही रात बितानी पड़ती है। कई वर्षों के बाद भी प्रशासन द्वारा कहीं स्थायी रूप से बसाने की पहल नहीं की गई। बाढ़ का कहर हर वर्ष इसी तरह झेलना पड़ता है।

मो.मुस्तफा कहते हैं कि जब भी गंडक नदी उफान पर होती है, गांवों में बाढ़ का पानी फैल जाता है। परिवार एवं मवेशियों के साथ तटबंध पर शरण लीेनी पड़ती है। सरकारी मदद के नाम पर मात्र हर वर्ष एक प्लास्टिक ही दिया जाता है। आज तक बाढ़ पीड़ितों की सुधि लेने वाला कोई नही है। अलाउद्दीन अहमद बताते हैं कि बाढ़ की कहर से सैकड़ों एकड़ फसल किसानों का हर साल इसी तरह बर्बाद हो जाती है । गंडक नदी के तांडव वे रात को नींद तक नही आ रही है। नदी के बाढ के पानी से बचने को हर साल ऊंचे स्थान पर शरण लेना पड़ता है। कहते हैं अधिकारी :-

बाढ़ प्राकृतिक आपदा है। गंडक नदी के किनारे बने तटबंध की सुरक्षा को लेकर अभियंताओं की टीम मुस्तैद रहती है।

शेखर आनंद, एसडीएम

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