कहीं नहीं खुला है सामान, कहीं खुलती ही नहीं प्रयोगशाला

जिले के बच्चे विज्ञान विषय में आधी अधूरी पढ़ाई कर परीक्षा में बैठने को मजबूर होते हैं। यह दीगर बात है कि ऐसे बच्चे परीक्षा में उत्तीर्ण भी हो जाते हैं परंतु प्रायोगिक पढ़ाई नहीं होने के कारण ये बच्चे विज्ञान विषय के वास्तविक ज्ञान से वंचित रह जाते हैं।

JagranMon, 29 Nov 2021 06:07 PM (IST)
कहीं नहीं खुला है सामान, कहीं खुलती ही नहीं प्रयोगशाला

जागरण संवाददाता, सुपौल। जिले के बच्चे विज्ञान विषय में आधी अधूरी पढ़ाई कर परीक्षा में बैठने को मजबूर होते हैं। यह दीगर बात है कि ऐसे बच्चे परीक्षा में उत्तीर्ण भी हो जाते हैं परंतु प्रायोगिक पढ़ाई नहीं होने के कारण ये बच्चे विज्ञान विषय के वास्तविक ज्ञान से वंचित रह जाते हैं। उसमें भी तब जब सरकार ने विज्ञान में प्रायोगिक की पढ़ाई को लेकर विद्यालयवार लाखों रुपये के उपकरण व सामग्री दे रखी है। लेकिन स्थिति है कि बच्चे विद्यालय से पास कर निकल जाते हैं लेकिन वे इस दौरान प्रयोगशाला कक्ष का मुंह तक नहीं देख पाते हैं।

मतलब साफ है कि जिले में प्रयोगशाला में प्रायोगिक कक्षा कराए बिना ही विज्ञान विषय की पढ़ाई पूरी कर ली जाती है। जबकि विज्ञान की पूरी पढ़ाई प्रयोग पर निर्भर है। दरअसल मैट्रिक और इंटरमीडिएट साइंस में विज्ञान की पढ़ाई को रुचिकर एवं सुलभ बनाने के लिए सरकार ने माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में लाखों रुपए खर्च कर प्रयोगशाला सामग्री उपलब्ध कराई है। परंतु इसका उपयोग बच्चों की पढ़ाई में ना होकर यह महज विद्यालयों की शोभा बढ़ा रही है। इसकी तह में जाएं तो दो ऐसे कारण हैं जो बच्चे को विज्ञान की आधी अधूरी पढ़ाई करने को विवश कर रहा है। एक तो जिले के ऐसे विद्यालयों में विज्ञान शिक्षकों का अभाव है या फिर जहां शिक्षक उपलब्ध भी हैं तो इच्छाशक्ति के अभाव के कारण बच्चे पूर्ण रूप से पढ़ाई नहीं कर पाते।

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अधिकांश विद्यालयों में नहीं खुलती प्रयोगशाला

दरअसल 10वीं और 12वीं के विज्ञान विषय के छात्रों के लिए पढ़ाई के साथ प्रायोगिक कक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। इसके द्वारा रसायन भौतिक और जीव विज्ञान विषय के प्रश्नों का प्रयोगशाला में प्रैक्टिकल के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन प्रैक्टिकल कराने का कार्य अधिकांश विद्यालयों में पूरी तरह से ठप है। जिले के अधिकांश माध्यमिक तथा उच्च माध्यमिक विद्यालयों में विज्ञान शिक्षकों की कमी है। प्रायोगिक पढ़ाई व परीक्षा के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है । उच्च विद्यालयों के पाठ्यक्रम में 80 अंक लिखित एवं 20 अंक का प्रायोगिक है। इसी तरह इंटरमीडिएट के विज्ञान में 30 अंक का प्रायोगिक अनिवार्य है। बावजूद जिले में इन बच्चों को प्रायोगिक की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। जिससे अभिभावक व बच्चे भी अपने भविष्य को लेकर चितित हैं।

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शिक्षकों की भी है कमी

जिले में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों की संख्या 184 है । हाल के दिनों में सरकार ने पंचायत स्तर पर एक मध्य विद्यालय को माध्यमिक विद्यालय में उत्क्रमित भी किया है। ऐसे उत्क्रमित विद्यालयों की संख्या जिले में 45 है । उत्क्रमित विद्यालय की बात नहीं भी करें तो अन्य माध्यमिक विद्यालयों में आज भी विज्ञान शिक्षकों का घोर अभाव है । जिसके कारण विद्यालय में विज्ञान विषय की पढ़ाई नहीं हो पाती है। खासकर उच्च माध्यमिक विद्यालय जहां इंटर तक की पढ़ाई होती है वहां की स्थिति तो और बेघर बनी है। वर्षों पूर्व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में उत्क्रमित किए गए विद्यालयों में आज तक विषयवार शिक्षकों की बहाली संभव नहीं हो पाई है। कहीं एक या दो विषय के शिक्षकों के माध्यम से इंटरमीडिएट की पढ़ाई करवाई जा रही है । ऐसे में प्रायोगिक की बात कौन कहे विषय की पढाई होती ही नहीं है । स्थिति ऐसी है कि प्रयोगशाला के सामानों को कहीं दिमाग चाट रहा है तो कहीं रसायनिक तत्व रखे रखे खराब हो रहे हैं या फिर प्रायोगिक के सामान को कार्टून से खोला तक नही गया है ।

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