¨हदी के वजूद पर संकट, प्रयास की दरकार

सीतामढ़ी। ¨हदी विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शीर्ष पर आसीन है। पिछले साल तक ¨हदी विश्व में चौथे पायदान पर थी। ¨हदी ने चीन की मन्दारिन भाषा को पछाड़ते हुए यह स्थान हासिल किया। बावजूद इसके देश में ¨हदी बदहाल है। जिस गति से उर्दू और अंग्रेजी भाषा का विकास हुआ है, उस गति से ¨हदी का नहीं। आज ¨हदी साहित्य अपने सबसे बुरे दौर में है। हर साल ¨हदी दिवस पर ¨हदी को बचाने के दावे और वादे किए जाते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद ही वादे और दावे गुम हो जाते हैं। वोट की राजनीति के चलते राजनेता और मंत्री ¨हदी को अब तक संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा का दर्जा देने में नाकाम रहे हैं। यह तो कुछ कवि, साहित्यकार और रचनाकार ही हैं जो समय-समय पर अपनी रचनाओं के माध्यम से ¨हदी को बचाने की मुहिम में लगे हैं। हालांकि, उन्हें भी समर्थन की दरकार है। अंग्रेजी के उपन्यास व पत्रिकाएं आते ही बाजार में छा जाती हैं, जबकि ¨हदी के उपन्यास हो या अन्य रचनाओं को खरीदार तक नहीं मिलते। जाहिर है कि हमारा समाज ¨हदी के बदले अंग्रेजी को तरजीह दे रहा है। वैसे इसमें कोई शक नहीं है कि हमारा समाज बच्चों को ¨हदी के बजाए अंग्रेजी बोलने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में भेजा जा रहा है तो ¨हदी का प्रसार कैसे होगा? यह एक बड़ा सवाल है।

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बोले स्कॉलर ::

कितना अदभूत संयोग है कि हम अभी ¨हदी पखवाड़ा मना रहे हैं और इसी दौरान हमने नौ सितम्बर को भारतेंदु जयंती मनाई। भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने कहा था Þनिज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,

बिनु निज भाषा ज्ञान को, मिटत ना हिय को सूलÞ। हम बाजार के दौर में जी रहे हैं और यही बाजार हमारी भाषा, हमारी संस्कृति को तय कर रहा है। बाजार ने अंग्रेजी को सिर-आंखों पर बिठा रखा है और हमारी मातृभाषा उपेक्षित हो रही है। किसी देश को अगर गुलाम बनाना है तो पहले उस देश की संस्कृति और भाषा के प्रति लोगों के मन में हीनभावना पैदा करो, यही षड्यंत्र रचकर अंग्रेजों ने हम पर दो सौ सालों तक राज किया। आजादी के 72 साल बाद भी हम उस षड्यंत्र से उबर नहीं पाए, बल्कि अब तो और बुरी तरह जकड़े जा चुके हैं। आज भारतीय समाज के वैचारिक और सांस्कृतिक पतन का मूल कारण स्वभाषा के प्रति दुराव है। एक लम्बी साजिश के तहत अंग्रेजी को बाजार की भाषा, तथाकथित सभ्य समाज की भाषा बनाई गई है। लेकिन, हमें यह याद रखना होगा कि ¨हदी बाजार की भाषा नहीं, संस्कार की भाषा है। ¨हदी आज उपेक्षित जरूर है, लेकिन विचार, संस्कृति और संवेदनशीलता को बचाए रखने के लिए हमें ¨हदी की ओर लौटना ही होगा। हो सकता है, अंग्रेजी भाषा के माध्यम से हम गाढ़ी कमाई कर लें, विदेशों में अच्छी जगह नौकरी पा लें, लेकिन भारतीय संस्कृति के मूल में सिर्फ अर्थोपार्जन तो कतई नहीं है। अभी बाजार, पूंजी हम पर हावी है, हम अंधाधुंध दौड़ में शामिल हैं, इसलिए अभी ¨हदी उपेक्षित-सी है। एक समय जरूर ऐसा आएगा जब हमें अपनी भाषा की, अपने संस्कारों की जरूरत होगी। हो सकता है यह बदलाव आने में पीढि़यां लग जाए, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हमारा समाज फिर भारतेंदु, प्रेमचंद, निराला और प्रसाद की तरफ लौटेगा। इसकी शुरुआत हम कर सकते हैं, आप कर सकते हैं। ¨हदी दिवस क्यों, ¨हदी पखवाड़ा क्यों, हम ताउम्र ¨हदी पढ़ें। हमारा हर दिन ¨हदी दिवस हो, और यह इस दौर में ही करना होगा। पतन की ओर बढ़ रहे भारतीय समाज को बचाने का दायित्व हमारे-आपके हाथों में है। आइए ¨हदी अपनाएं और अपने समाज को बचाएं। :- अमन आकाश, स्कॉलर।

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बोले साहित्यकार ::

आज की युवा पीढ़ी अपनी भाषा और संस्कृति की सीढ़ी चढ़ना भूल गई है। वाइफाई और नेट के युग में आज का युवा अपने मूल्यों से कटते जा रहे हैं और झूठे प्रदर्शन में जीने लगे हैं। ¨हदी दर्शन है और अंग्रेजी प्रदर्शन। स्वभाविक है कि ¨हदी साहित्यकारों की पूछ कम हुई है। लेकिन, अंतत: ¨हदी उस पावन गंगाजल की तरह है जिसकी महिमा अथाह सागर के जल से कहीं ज्यादा है। भारत की मातृभाषा ¨हदी है, लेकिन यहां अधिकतर कार्य अंग्रेजी में संपादित किए जा रहे हैं। अभिभावक अपने बच्चों को ¨हदी की बजाए अंग्रेजी सीखने पर जोड़ देते हैं। चंद ¨हदी के कलमकार, साहित्यकार व कवि ¨हदी की गरिमा को बचाने के लिए मुहिम में लगे हैं।

सरकारी नीति का दस्तावेजीकरण हो या फिर उच्च शिक्षा की पढ़ाई के लिए उपयोगी पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में सहज रूप से उपलब्ध है। कानून की किताब से लेकर डॉक्टरी, इंजीनिय¨रग व प्रतियोगिता परीक्षा संबंधी उपयोगी पुस्तक से लेकर पत्र पत्रिका तक अंग्रेजी भाषा में सर्वत्र उपलब्ध है, लेकिन ¨हदी भाषा में बेहतर किताब मिलना मुश्किल होता है। :- गीतेश, साहित्यकार।

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