मजदूरी की आग में जलते चूल्हे तो भरता परिवार का पेट, बेजां देह से पहले पहुंची मौत की खबर

सीतामढ़ी। बेलाहीं-नीलकंठ पंचायत अंतर्गत खोंपा गांव का कोठियां टोला जहां एकसाथ तमाम मजदूरों

JagranWed, 28 Jul 2021 11:26 PM (IST)
मजदूरी की आग में जलते चूल्हे तो भरता परिवार का पेट, बेजां देह से पहले पहुंची मौत की खबर

सीतामढ़ी। बेलाहीं-नीलकंठ पंचायत अंतर्गत खोंपा गांव का कोठियां टोला, जहां एकसाथ तमाम मजदूरों की मौत से सारा आलम सन्न है। सबकी आंखें नम हैं। मातमी सन्नाटा पसरा है। रह-रहकर घर के अंदर से मां, बहन-बेटियों व मृतकों की पत्नियों की चित्कार सुनाई पड़ती है। एक झटके में उन नाबालिग बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया जो अपने पिता के परदेस से लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। किसी का सुहाग उजड़ा तो किसी की कोख। लखनऊ-अयोध्या हाइवे पर बस हादसे में इनके अपने हमेशा-हमेशा के लिए खो गए। इन सभी परिवारों के चुल्हे मजदूरी की आग में जलते थे। समय-समय पर मजदूरी करने इन परिवारों से कमाऊ सदस्य पंजाब व हरियाणा जाते थे। वहां से मिली मजदूरी से गृहस्थी चलती।

पिता की हुई मौत तो बेटा जिदगी भर के लिए हो गया अपाहिज

हादसे में जगदीश सहनी पिता-पुत्र दोनों साथ में थे। 45 वर्षीय जगदीश सहनी की मौत हो गई। पुत्र संतोष कुमार जख्मी होकर ट्रामा सेंटर में भर्ती है। जगदीश सहनी के भाई मुंदर सहनी भी जख्मी हैं। रुदल सहनी के एक पुत्र मोनू सहनी की मौत हो गई। दूसरे पुत्र फगुनी सहनी भी गंभीर जख्मी हैं। इस हादसे में बचे भोला सहनी अब खेतों में काम करने के लायक नहीं रह गए। इनका एक पैर काटना पड़ा है। महेंद्र सहनी के दोनों पुत्र वीरेंद्र सहनी व शंभू सहनी जीवन व मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। इस हादसे में मरने वाले सभी अपने अपने परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य थे। 80 साल की मां सुकुल देवी अभी जीवित हैं तो उनके बेटे जगदीश सहनी के प्राण पखेड़ू उड़ गए। जगदीश की पत्नी जेबरी देवी का सुहाग उजड़ गया। मोनू सहनी की विधवा सावित्री तथा नरेश सहनी की पत्नी सुरतिया की तो दुनिया ही उजड़ गई। सावित्री के आगे एक लड़का तथा दो लड़की है। सुरतिया को दो पुत्र व एक पुत्री है। अब इन महिलाओं के सामने बच्चों के भरण-पोषण की समस्या गंभीर है। इसी प्रकार इंदल महतो की पत्नी आशा के नाबालिग बच्चों का भविष्य है। जिनके सपने टूटते दिखाई पड़ रहे हैं। आशा की आंखों से अविरल बहते आंसू उसकी हालत को बयां कर रहे हैं। इसके घर के चुल्हे नहीं जले हैं। घर में खाने के लिए अनाज भी नहीं है। अगर सरकार से मदद नहीं मिली तो इन परिवारों के चूल्हे नहीं जलेंगे।

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