रति की प्रेम व वेदना में निहित है मेरी भी सुनो डार्विन की आत्मा

पूर्णिया। ख्यातिप्राप्त कथाकार सह सैन्य अधिकारी दीर्घ नारायण की नई कहानी मेरी भी सुनो डावि

JagranSun, 17 Oct 2021 07:31 PM (IST)
रति की प्रेम व वेदना में निहित है मेरी भी सुनो डार्विन की आत्मा

पूर्णिया। ख्यातिप्राप्त कथाकार सह सैन्य अधिकारी दीर्घ नारायण की नई कहानी मेरी भी सुनो डार्विन पर रविवार को कथा पाठ का आयोजन कथा गोष्ठी के रूप के किया गया । रामबाग स्थित ग्रीन हाउस में आयोजित इस गोष्ठी में साहित्य व कला साधकों की जमघट रही। कहानी की नायिका रति की प्रेम व वेदना में इसकी आत्मा निहित है।

कार्यक्रम के आरंभ में डा. कमल किशोर चौधरी ने कथा का पाठ किया। बाद में अन्य रचनाकारों ने कथा परिक्रमा के तहत कहानी के संदर्भ में अपनी अपनी राय व्यक्त की । सभी ने इस कहानी को वर्तमान दौर में एक मौजू कहानी के रूप में परिभाषित किया । गोष्ठी की अध्यक्षता आकाशवाणी के अवकाश प्राप्त निदेशक विजय नंदन प्रसाद व मंच संचालन कवि सह रंगकर्मी उमेश आदित्य ने किया । मुख्य वक्ता के रूप में पूर्णिया महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. मु. कमाल, कथाकार चंद्रकांत राय , सुरेंद्र शोषण, कवि गौरी शंकर पर्वोत्तरी, संजय सनातन, डा. रामनरेश भक्त, गोपाल चंद्र घोष मंगलम, कमल किशोर चौधरी, किरण झा किरण, बिमल कुमार बिमल, कपिदेव महतो, कल्याणी, कैलाश बिहारी चौधरी व गोविद कुमार, मौजूद थे । समाज के लिए बड़ा संदेश कथाकार दीर्घनारयण ने कहानी के संदर्भ में अपनी बातों को रखते हुए बताया कि यह कहानी पाखी में प्रकाशित हो चुकी है । मूल रूप से कहानी में यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार एक नारी पुरुष के प्रेम व बहकावे में पड़कर पीड़ा की भागी बनती है । यह कहानी चार मुख्य पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें मुख्य रूप से नारी पात्र रति और तीन पुरुष पात्र मनस्व, नमन और चंद्रेश शामिल हैं । लेखक द्वारा नारी के प्रेम की वेदना, नारी मन की पीड़ा, और औरतों के प्रति मर्दों का पल्ला झाड़ वाली मनोवृति का चित्रण बखूबी किया गया है । कहानी की मुख्य पात्र रति सच्चे प्यार को पाने के लिए पहले मनस्व फिर नमन और चंद्रेश के प्रेम में पड़ जाती है। इससे उलट तीनों ही उसे भोग की वस्तु हीं समझते हैं । इस वजह से रति को प्रेम में पढ़कर असहनीय पीड़ा का सामना करना पड़ता है। दरअसल लेखक ने अपनी इस कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया है, कि प्रेम की भी अपनी सीमाएं होती है । किसी भी स्त्री को प्रेम में पड़कर ऐसी किसी भी स्थिति को जन्म नही देना चाहिए, जिसकी वजह से उसे मानसिक वेदना का शिकार होना पड़ जाए । इसके लिए लिए अपनी सभ्यता और आचरण पर विचार करते हुए ही प्रेम करना सही होता है । लेखक ने पुरुषों में पलने वाले नारी शोषण की भावना को भी बखूबी दर्शाया है । इस मौके पर कवि दिनकर दीवाना, रंजीत तिवारी, सुनील समदर्शी, सुमित प्रकाश, ललन कुमार, अरुण कुमार, विभूति प्रसाद , नीलम अग्रवाल, श्वेत साक्षी व कुंदन कुमार भी मौजूद थे ।

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