Sonpur Mela, Bihar: कोरोना ने छीनी मेलों की रौनक, आजादी के बाद पहली बार नहीं लगा सोनपुर मेला

बिहार के विश्वप्रसिद्ध सोनपुर मेला का दृश्य। जागरण आर्काइव।

आजादी के बाद यह पहला मौका है जब सोनपुर में लगने वाला विश्वप्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र का मेला आयोजित नहीं हो रहा। इसके पहले राजगीर में लगने वाला मलमास मेला और भगवान महावीर की निर्वाणस्थली पावापुरी में आयोजित होने वाला महोत्सव भी रद हो चुका है।

Publish Date:Mon, 30 Nov 2020 03:51 PM (IST) Author: Akshay Pandey

कुमार रजत, पटना। कोरोना ने मेलों की रौनक भी छीन ली है। एक के बाद एक मेले और महोत्सव टलते जा रहे। आजादी के बाद यह पहला मौका है, जब सोनपुर में लगने वाला विश्वप्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र का मेला आयोजित नहीं हो रहा। मेला परिसर की चकाचौंध की जगह वीरानगी पसरी है। इसके पहले राजगीर में लगने वाला मलमास मेला और भगवान महावीर की निर्वाणस्थली पावापुरी में आयोजित होने वाला महोत्सव भी रद हो चुका है। यही नहीं, दिसंबर में लगने वाले प्रसिद्ध राजगीर महोत्सव और जनवरी में आयोजित होने वाले बौसी के मंदार महोत्सव का रद होना भी तय माना जा रहा है। इसके पूर्व 1946 ई. में दंगों के कारण सोनपुर मेले का आयोजन रद किया गया था।

मौर्य व गुप्त काल में भी सोनपुर मेले का जिक्र

सोनपुर मेले की शुरुआत कब हुई, इसका कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता मगर मौर्य व गुप्त काल में भी सोनपुर मेले के आयोजन से जुड़े प्रमाण मिलते हैं। सोनपुर मेले पर रिसर्च करने वाले उदय प्रताप सिंह बताते हैं कि गुप्तकाल में बज्जियों का सात दिनों का महोत्सव होता था। इन सात दिनों में नृत्य-गीत का आयोजन होता था जो सोनपुर मेले की तरह ही था।

जंग में होता था हाथी-घोड़ों का इस्तेमाल, सोनपुर से होती थी खरीदारी

लेखक डॉ. मोतीचंद्र अपनी किताब 'सार्थवाह' में भी सोनपुर मेले का जिक्र करते हैं। वे लिखते हैं, मौर्य युग में तक्षशिला से बनारस के रास्ते वैशाली के उल्काचेल (सोनपुर का बुद्धकालीन नाम) तक कंबोज, सिंध, पंजाब, बलख आदि के घोड़े बिक्री के लिए आते थे। मौर्य काल में भी यहां हाथियों का सबसे बड़ा मेला लगता था। इसी तरह बाद में मुगलकाल में भी सोनपुर के पशु मेले का जिक्र मिलता है। उस दौर में हाथी-घोड़ों का इस्तेमाल ही जंग में किया जाता था जिसके लिए खरीदारी सोनपुर मेले से की जाती थी।

कविता के रूप में सोनपुर मेले का जिक्र

मुगलकाल के दौरान 1626 ई. में 'हनुमन्नाटक' के रचियता कवि हृदय राम ने एक पत्र में कविता के रूप में सोनपुर मेले का जिक्र किया है। वे लिखते हैं-'उत्तम हरिहरक्षेत्र को देखत चित्र लुभाय, यहां आए सब मरन को, पाप-ताप जरि जाय।' अंग्रेजी अफसर जॉन मार्शल ने भी छह नवंबर 1671 की तारीख में सोनपुर मेले का जिक्र करते हुए लिखा है कि गंगा स्नान और मेले के लिए 40 से 50 हजार लोग मौजूद थे।

19वीं सदी में था रेसकोर्स, आते थे दो हजार हाथी

अंग्रेज हैरी एबॉट की किताब रेमिनिसेंसेज ऑफ सोनपुर (1840-96) में सोनपुर मेले से जुड़ी कई खास बाते हैं। एबॉट लिखते हैं कि इस दौरान मेले में घुड़दौड़ के लिए रेसकोर्स भी था। अंग्रेज घुड़दौड़ के शौकीन थे, पहले इसके लिए हाजीपुर में रेसकोर्स बनाया गया था मगर गंडक नदी के कटाव के बाद सोनपुर में रेसकोर्स बनवाया गया। 1958 में प्रकाशित मुजफ्फरपुर गजेटियर में भी उल्लेख मिलता है कि अंग्रेज यहां पोलो भी खेलते थे। उस समय रेलवे लाइन बिछाने से लेकर बड़े-बड़े उद्योगों का लगाने में हाथियों का इस्तेमाल होता था। यही कारण है कि उस दौर में दो हजार से अधिक हाथी मेले में बिक्री के लिए आते थे।

थिएटर से भी मिली मेले को ख्याति

रिसर्चर उदय प्रताप सिंह बताते हैं कि 1930 के आसपास मेले में नौटंकी और थिएटर का आगमन हुआ। इसके पहले रामलीला आदि होती थी। 1950 के दशक में प्रसिद्ध गुलाबबाई का थिएटर आया। बाद में गुलाबबाई को पद्मश्री सम्मान भी मिला। गुलाबाबाई के थिएटर का जादू ऐसा था कि आज भी सोनपुर मेले में उनके नाम से ही थिएटर लगते हैं। बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी मेले में आते थे।

21वीं शताब्दी में फीकी पड़ने लगी रौनक

एक दौर में सोनपुर मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता था मगर आधुनिकता और कई प्रतिबंधों ने इसकी रौनक कम कर दी। 21वीं सदी में पशुओं की खरीद-बिक्री पर लगे रोक के आदेश और हाथियों के आने पर प्रतिबंध ने मेले की रौनक काफी हद तक कम कर दी। सिनेमा के बढ़ते चलन के कारण थिएटर को लेकर भी लोगों का रुझान घटा। थिएटर में अश्लीलता की शिकायतों ने भी एक वर्ग को इससे दूर कर दिया। बावजूद अब भी बड़ी संख्या में हर साल लोग ग्रामीण परिवेश का लुत्फ लेने सोनपुर मेला आते रहे हैं। उम्मीद है कि अगले बरस मेला फिर से अपनी रौनक के साथ लौटेगा।

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