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दो भाषाओं ने कराया एेसा मेल कि हिंदी पढ़ा रहे जावेद तो उर्दू की तालीम दे रहे सूरज देव, जानें Patna News

पटना, जेएनएन। इनकी जबान का जवाब नहीं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में डॉ. फिरोज खान के संस्कृत पढ़ाने के विवाद पर पीयू के शिक्षकों ने ठान लिया कि दिखा देंगे, भाषा का कोई धर्म नहीं होता। पटना विश्वविद्यालय में 2003 से डॉ. सूरज देव सिंह उर्दू तो टीपीएस कॉलेज में प्रो. जावेद अख्तर लगभग ढाई दशक से हिंदी पढ़ा रहे हैं।

खुले दिल से सबका समर्थन

छात्रों की जुबानी में दोनों का कोई जोड़ नहीं है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में डॉ. फिरोज खान के संस्कृत पढ़ाने के विवाद पर पीयू के शिक्षकों ने कहा कि भाषा क्षेत्र और धर्म की गुलाम नहीं होती। गुरुवार को हर जुबान पर उर्दू विभाग के डॉ. सूरजदेव सिंह के उर्दू और प्रो. जावेद अख्तर के हिंदी में समर्पण को याद किया। पटना साइंस कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. राधाकांत प्रसाद ने कहा कि बीएचयू प्रकरण से संस्कृत का बहुत नुकसान होगा। डॉ. फिरोज का खुले दिल से सभी को समर्थन करना चाहिए।

इंटर के बाद उर्दू में जिज्ञासा बढ़ी

डॉ. सूरज देव सिंह ने बताया कि इंटरमीडिएट के दौरान उर्दू में आगे पढ़ाई करने की जिज्ञासा हुई। परिवार और साथियों में से किसी ने विरोध नहीं किया। 1992 में रांची विश्वविद्यालय से उर्दू में ऑनर्स के बाद जेएनयू का रुख किया। जेएनयू से उर्दू में एमए, एमफिल, जेआरएफ तथा पीएचडी की। 2002 में पीएचडी पूरा होने के बाद बीपीएससी से सेलेक्शन हुआ।

हिंदूस्तान की भाषा है उर्दू

डॉ. सूरज देव सिंह ने बताया कि मगध महिला कॉलेज में लगभग 16 साल तक छात्राओं को उर्दू पढ़ाया। पढ़ाई और पढ़ाने के दौरान किसी ने हिंदू धर्म होने के कारण सवाल खड़ा नहीं किए। डॉ. फिरोज का प्रकरण काफी दुखद है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। उर्दू हिंदूस्तान की जुबान है। यहीं पैदा हुई है। भाषा को धर्म से जोड़ना खुद को मध्य युग में ले जाने जैसा है।

बीएचयू विवाद के बाद जाना भाषा का भी धर्म है

टीपीएस कॉलेज के प्रो. जावेद अख्तर ने कहा कि ढाई दशक से हिंदी के प्राध्यापक के रूप में कभी भाषा का धर्म होने का अहसास नहीं हुआ। बीएचयू विवाद ने बता दिया कि भाषा का भी धर्म होता है। इस तरह प्रश्न उठाने वाले किसी के नहीं होते। मुस्लिम समुदाय के लोग सदियों से संस्कृत पढ़ते और पढ़ाते आए हैं। इससे संस्कृत का ही नुकसान होगा। इसका पूरे देश में विरोध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा को धर्म से जोड़कर देखना निहायत गलत है। शिक्षा का कोई धर्म नहीं होता है, इसलिए शिक्षक किस संप्रदाय या जाति का है, कोई मायने नहीं रखता है। लिहाजा, बीएचयू में डॉ. फिरोज को लेकर छिड़ा विवाद कतई न्यायसंगत नहीं है।

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