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बिहार का यह मंदिर वर्षों से है खुद पाबंद, कोरोना महामारी का भी यहां नहीं पड़ा असर

नालंदा जिले के गिरियक प्रखंड के घोसरावां गांव में स्थित आशापुरी मंदिर।

नालंदा जिले के गिरियक प्रखंड के घोसरावां गांव में एक ऐसा मंदिर है जहां हर साल शारदीय व चैत्र नवरात्र के समय गर्भ गृह में महिलाओं व पुरुषों के प्रवेश पर पूर्ण पाबंदी रहती है। मां पूरे नवरात्र एक तरह से एकांतवास करती हैं।

Akshay PandeyTue, 13 Apr 2021 05:35 PM (IST)

जागरण संवाददाता, बिहारशरीफ: नालंदा जिले के गिरियक प्रखंड के घोसरावां गांव में एक ऐसा मंदिर है, जहां हर साल शारदीय व चैत्र नवरात्र के समय गर्भ गृह में महिलाओं व पुरुषों के प्रवेश पर पूर्ण पाबंदी रहती है। मां पूरे नवरात्र एक तरह से एकांतवास करती हैं। सिर्फ मंदिर के पुजारी ही जरूरी अनुष्ठान करते हैं। यह परंपरा ग्रामीणों के सहयोग व समर्थन से सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। कोरोना को लेकर पाबंदी अन्य मंदिरों के लिए है, यह मंदिर खुद पाबंद है। बिहारशरीफ मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर घोसरावां गांव में नवरात्र के समय पूरे दस दिनों तक इस मंदिर में महिलाओं के अंदर प्रवेश करने पर पाबंदी लगा दी जाती है।

पूजा से पूरी होती है मनोकामना

पौराणिक प्रथानुसार इस मंदिर का नाम आशापुरी रखा गया क्योंकि यहां बौद्ध काल में 18 सौ बौद्ध भिक्षु आकर अपनी मन्नत मांगते थे और उनकी मन्नतें भी पूरी होती थीं। मंदिर की मान्यता के बारे में पुजारी पुरेन्द्र उपाध्याय ने बताया कि नवरात्र के समय इस मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित रहता है। यहां प्रतिपदा से लेकर दस दिनों तक विजयादशमी की आरती के पहले तक मंदिर के गर्भ गृह में पुरुषों का भी प्रवेश पूर्ण रूप से वर्जित रहता है क्योंकि यह इलाका प्राचीन काल से तांत्रिकों का गढ़ माना गया है। यहां तांत्रिक सिद्धि प्राप्त करते थे। उसी समय से पूरे नवरात्र यहां तांत्रिक पूजा यानी तंत्रियाण पूजा होती है। तंत्रियाण पूजा में महिलाओं का प्रवेश निषेध माना गया है। यह प्रथा आज से नहीं बल्कि सैकड़ों साल से ही चली आ रही है।

राजा घोष ने करवाया था मंदिर का निर्माण

पूर्वजों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण राजा घोष ने करवाया था। इसीलिए इस गांव का नाम घोसरावां पड़ा। आशापुरी मां स्वयं प्रकट हुई थीं और जिस स्थान पर वे प्रकट हुईं, वहीं पर मंदिर का निर्माण करवाया गया। नवरात्र के समय घोसरावां के इस मंदिर में बिहार के अलावे कोलकाता ओड़िसा मध्य प्रदेश, असम, दिल्ली, झारखंड समेत पूरे बिहार के दूरदराज इलाके से श्रद्धालु आकर दस दिनों तक पूजा-पाठ करते है। मान्यता है कि मां आशापुरी भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं।

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