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खरी-खरी: बिहार की सियासत में विकल्प अभी बाकी है, पता नहीं कौन-सा कनेक्‍शन काम आ जाए...

पटना [रमण शुक्ला] । बिहार की सियासत में उच्च सदन का माननीय बनने के लिए सीढ़ी तलाशने का सिलसिला शबाब पर है। एक दौर की बाजी हारने के बाद भी दावेदार हताश-निराश नहीं हुए हैं। मनोनयन कोटा को लेकर उम्मीद सातवें आसमान पर है। किसी को अभी नागपुर कनेक्शन पर भरोसा है तो कोई कमल को पैदा कर उसे प्रौढ़ बनाने की दंभ में अपनी दावेदारी पक्की मान रहा है। किसी को सामाजिक समीकरण पर गुरुर है तो कोई कब्र में पांव होने के बावजूद सत्ता सुख का मोह त्यागने के लिए तैयार नहीं। फिलवक्त दावेदारों के दिल में मौका चुकने के बावजूद सिर्फ इस बात का चैन है कि विकल्प अभी बाकी है। पता नहीं, कौन सा कनेक्शन काम कर जाए। दिल्ली वाले पर पूरा भरोसा है। बिहार वाले हर कुर्बानी से तीन दशक से परिचित हैं। बस अब डर केवल इस बात का सता रहा है कि अपनों की सियासत का कांटा कहीं चुभ न जाए।

वंशवाद ने कर दिया मायूस

अरसे इंतजार के  बाद मौका आया था। उम्मीद थी, लिहाजा संगठन की सेवा में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रहने दी। पार्टी के भगवा रंग को घर-घर और हर दिल में गाढ़ा करने में जवानी कुर्बान कर दी। परिवार की अनदेखी ने कहीं का नहीं छोड़ा। जवानी भी अब ढलने लगी है। फिर भी मनहूस प्रारब्ध है कि पीछा नहीं छोड़ रहा। मुंह नहीं खोलने की वजह से उम्मीद का दामन हर बार मुठ्ठी से रेत की तरह फिसलता जा रहा है। तरक्की तो दूर, जहां थे वह कुर्सी भी खिसक गई। पटना से दिल्ली तक की दौड़ काम नहीं आई। वंशवाद के पालने में पले और वातानुकूलित आब-ओ-हवा वाले पिता-पुत्र और ससुर-बहू एडजस्ट हो गए। ऐसे में संगठन के लिए खून-पसीना बहाने वालों के मन में एक अदद जगह की हसरत धरी की धरी रह गई। वर्षों दिन-रात एक करने वालों की मेहनत को वंशवाद ने पलीता लगा दिया। पता नहीं अब कब मौका मिलेगा। 

बेजोड़ विरासत छोड़ गए गोरे

शासन वाले साहबों को महज सांस से फैलने वाली बीमारी से बचाव के लिए आजादी के सात दशक बाद भी गोरों की विरासत पर फक्र है। मुरीद ऐसे हैं कि कोई तीन बाई आठ तो कोई ढाई बाई छह की टेबल के फायदे गिनाते नहीं थक रहा। नमस्कार और प्रमाण की परंपरा का विश्लेषण करने के मामले में तो मानो साहब ने डॉक्टरेट कर रखी हो। हर आने-जाने वालों को संक्रमण से बचाव की नसीहत दे रहे। एक सांस में अंग्रेजों की सृजित व्यवस्था, बड़े कमरे में बैठने के सुख की तारीफ में तमाम नजीर पेश करने में साहबों ने अनुपम ज्ञान संग्रह कर रखा है। नवाबों के शहर और खानदानी परिवार से आने वाले साहब बतकही के बयार में इस कदर बह जाते हैं कि दशकों पुरानी रवायत पर बोलने में उनके सामने शायद ही कोई टिक पाए।

सोना में कोई संकट नहीं

सत्ता के गलियारे में इन दिनों कोरोना संकट के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था के चर्चे, रोजगार के शिगूफे और निवेश के रास्ते तलाशने वालों को रायचंद सबसे बेहतर विकल्प सोना को बता रहे हैं। डर केवल छापेमारी और चोरी का है। इस एहतियात के बाद सारा मामला चोखा मान कर दबाते रहने की सलाह दे रहे हैं। दरअसल, माननीय से लेकर साहबों के बीच ट्रांसफर-पोस्टिंग वाले मौसम में पेटी का पेटी माल उतरा है। कुर्सी और जिम्मेदारी के हिसाब से बोली लगी है। ऐसे में निवेश के तमाम विकल्प पर मंथन का दौर तेज है। इस बीच सोना की कीमत में तेजी के पीछे का खेल और भविष्य के फायदे समझाने वाले बुद्धिजीवियों की बाढ़ सी आ गई है। पेटी लेने वाले साहबों के बीच बेचैनी बढ़ी हुई है। वजह तेजी से पांव पसार रहा कोरोना संक्रमण है, जिसने अच्छे-अच्छों की नींद उड़ा दी है। 

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