पश्चिम बंगाल के परिणाम से बिहार में विपक्ष का बढ़ेगा हौसला, सरकार पर कम होगा भाजपा का दबाव

बंगाल चुनाव परिणाम का बिहार में भी होगा असर। प्रतीकात्मक तस्वीर।

पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम का बिहार की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? यह सवाल चुनाव की घोषणा होने के समय से पूछा जा रहा है। अब परिणाम आ गया है। जवाब तुरंत नहीं मिलने जा रहा है। यह टुकड़ों में मिलेगा।

Akshay PandeySun, 02 May 2021 04:57 PM (IST)

अरुण अशेष, पटनाः पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम का बिहार की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? यह सवाल चुनाव की घोषणा होने के समय से पूछा जा रहा है। अब परिणाम आ गया है। जवाब तुरंत नहीं मिलने जा रहा है। यह टुकड़ों में मिलेगा। इसे लोग देख भी पाएंगे। सबसे पहला असर सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के दलों की चाल ढाल में दिखेगा। भाजपा से कम सीटें लाकर भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। उन्हें केंद्रीय नेतृत्व ने करार के तहत मुख्यमंत्री बनाया। नीतीश कह रहे थे कि वह इस पद के लिए कतई इच्छुक नहीं हैं। इसे गृह मंत्री अमित शाह ने भी स्वीकार किया। फिर भी इस पारी में नीतीश  को बार-बार यह अहसास कराया जा रहा है कि भाजपा बड़ी पार्टी है। अहसान मानिए। यह पार्टी के कुछ बड़े नेताओं के बयान से जाहिर होता है। सत्ता में अधिक भागीदारी  मांग के रूप में जाहिर होता है। नीतीश को नापसंद करने वाले भाजपा नेताओं को उम्मीद थी कि  बंगाल में जब दो सौ पार होगा, बिहार में उन्हें खेलने के लिए मैदान मिल जाएगा। फिलहाल यह उम्मीद खत्म हो गई है। नीतीश कुमार इस हद तक इत्मीनान हो सकते हैं कि भाजपा के अंदर का वह समूह शांत रहेगा जो सरकार पर दबाव बनाने के लिए व्यग्र रहता है।

तेजस्वी ने मांगे थे तृणमूल के लिए वोट

विपक्ष भी बंगाल के चुनाव परिणाम का इंतजार ही कर रहा था। मुख्य विपक्षी दल राजद वहां चुनाव नहीं लड़ रहा था। उसकी ताकत तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में लगी थी। तेजस्वी यादव ने टीएमसी के पक्ष में चुनावी सभाओं को संबोधित किया। राजद ने मान लिया था कि बंगाल में भाजपा की हार में ही उसकी जीत है। इस हिसाब से राजद अपनी जीत महसूस कर सकता है। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद बाहर आ गए हैं। तुरंत में लालू प्रसाद कुछ नहीं करने जा रहे हैं। लेकिन, बंगाल में अपेक्षित कामयाबी न मिलने के चलते भाजपा पर जो मनोवैज्ञानिक दबाव बन रहा है, उसे लालू प्रसाद की मौजूदगी बढ़ाएगा ही। क्या इन दोनों कारणों से बिहार की सत्ता में कोई बदलाव होगा, फिलहाल यह संभावना नजर नहीं आ रहा है। हां,  यह परिणाम सत्तारूढ़ दल को अधिक सतर्क रहने की सलाह देता है।

सहयोगियों की इज्जत बढ़ेगी

एक असर एनडीए के छोटे सहयोगी दलों-हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी पर पड़ेगा। दोनों के चार-चार विधायक हैं। सरकार इनके आठ विधायकों पर निर्भर है। संयोग से दोनों दलों के नेतृत्व की प्रतिबद्धता भ्रमणशील रही है। इन दिनों दुखी भी चल रहे हैं। दोनों दलों को कैबिनेट में अधिक जगह चाहिए। विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी का दर्द है कि उन्हें विधान परिषद की छोटी अवधि वाली सीट दी गई। मोर्चा अध्यक्ष जीतनराम मांझी की पीड़ा है कि आश्वासन के बाद भी उन्हें परिषद में कोई सीट नहीं दी गई। बंगाल का परिणाम दोनों को सौदेबाजी का नया अवसर दे सकता है।

लोजपा ले सकती है स्टैंड

अब यह साफ हो गया है कि बिहार विधानसभा चुनाव में लोजपा की अकेले लड़ने की रणनीति प्रायोजित थी। वह घाटे में रही। चुनाव परिणाम के बाद उसके साथ सब बुरा ही हुआ। केंद्रीय मंत्रिमंडल से कोटा खत्म हो गया। विधान परिषद में जगह नहीं मिली। इकलौते विधायक भी टूटकर जदयू से जुड़ गए। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान खामोश चल रहे हैं। बंगाल उन्हें भी मुंह खोलने का अवसर दे सकता है।

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