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गुरु की प्रेरणा से जीवन हुआ पूर्ण

पटना। गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरु को भगवान से भी ऊपर का दर्जा दिया गया है। गुरु न केवल अपने बच्चों को ज्ञान देते हैं बल्कि जीवन में छाए अंधकार को भी दूर कर उन्हें प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु के ज्ञान और उनकी प्रेरणा से न केवल जीवन पूर्ण होता है बल्कि जीवन का सही उद्देश्य को समझने का अवसर मिलता है। गुरु पूर्णिमा के बहाने शहर की इन हस्तियों से सुनिए उनके गुरु के बारे में.. गुरु ने बताया पढ़ने का तरीका -

गुरु के मार्गदर्शन के बिना सफलता नहीं मिलती। मेरे जीवन को बेहतर बनाने में कई गुरुओं ने अपना योगदान दिया। प्रारंभिक गुरु स्वर्गीय किशोर प्रसाद का जीवन में काफी प्रभाव पड़ा। सीतामढ़ी में रहकर मैट्रिक तक उन्हीं से शिक्षा प्राप्त की। गुरु हमेशा कहा करते थे कि बिना परिश्रम के कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। गुरु ने पढ़ने का तरीका बताया। कई सारे विषय जो कठिन थे, उन्हें सरल बनाने में गुरुओं का योगदान रहा। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के दौरान प्रो. केएन सिंह, विमलेश भैया का बड़ा योगदान रहा। आज जो भी कुछ बना हूं इसमें इन गुरुओं का बड़ा महत्व रहा है।

दीपक आनंद, निदेशक, बिहार म्यूजियम आध्यात्मिक गुरु ने पुलिस अधिकारी बनने की दी प्रेरणा

जीवन के हर मोड़ पर गुरुओं के बताई बातें हमेशा काम आती रही हैं। मेरे जीवन में शैक्षणिक और आध्यात्मिक गुरुओं को अहम रोल रहा है। गांव के प्राइमरी स्कूल में पहले गुरु विंध्याचल दुबे थे, जो स्वयं अनुशासन में रहने के साथ बच्चों को भी अनुशासन का पाठ पढ़ाते थे। मिडिल स्कूल में साधू शरण यादव गुरु बने। उन्होंने तो मुझे अपने घर में रखकर शिक्षा दी। हाईस्कूल में आने के बाद गुरु गणेश उपाध्याय का आशीष मिला। बक्सर हाई स्कूल में उनका बच्चों के प्रति बड़ा स्नेह रहता था। वे हमेशा अनुशासन में रहने के साथ मेहनत करने पर बच्चों को जोर देते थे। मैट्रिक की परीक्षा देने के बाद ही आध्यात्मिक गुरु से मिलने का अवसर मिला वे हमेशा से एक पुलिस अधिकारी बनने की प्रेरणा देते रहे। उनकी बातों से प्रेरित होकर पहली बार सिविल सेवा की परीक्षा में बैठा और उनकी प्रेरणा से 1986 में इनकम टैक्स विभाग में चयन हुआ। फिर भी हमारे गुरु को शांति नहीं मिली उनके कहने पर दुबारा सिविल सेवा की परीक्षा में बैठा और 1987 में पुलिस सेवा में आ गए।

गुप्तेश्वर पांडेय, डीजीपी, बिहार गुरु ने दिया लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहने की सीख -

वैसे तो जीवन के हरेक मोड़ पर कोई न कोई गुरु मिलता है लेकिन कुछ खास होते हैं जिनके प्रति आदर और सम्मान का भाव हमेशा बना रहता है। उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त हुई। इसमें गुरु विष्णु शर्मा का बड़ा योगदान रहा। पांचवीं तक की शिक्षा उनसे ही प्राप्त हुई। मोहम्मद अली सर जो एनसीसी के ट्रेनर थे, जिन्होंने जीवन में अनुशासन और लक्ष्य के प्रति ईमानदार बनने की सीख दी। दिल्ली में सिविल सेवा की तैयारी करने के दौरान गुरु रजनीश का मार्गदर्शन बेहद मददगार रहा। गुरु की प्रेरणा से ही केंद्रीय विद्यालय, विशाखापत्तनम में शिक्षक में बच्चों को पढ़ाने का अवसर मिला। वर्ष 2011 में सिविल सेवा में कामयाबी दिलाने में इन गुरुओं का कहीं न कहीं योगदान रहा।

मिथिलेश मिश्रा, जेल आइजी, बिहार पिता के सानिध्य में सरोद वादन की मिली शिक्षा -

पिता हीं पहले गुरु रहे जिन्होंने एक लड़की होने के बावजूद सरोद वादन की शिक्षा दी। आमतौर पर सरोद वादन पुरुष ही करते रहे हैं। मेरे पिता स्वर्गीय प्रो. सीएल दास अंग्रेजी के प्राध्यापक तो थे ही, उन्होंने मैहर घराने के संस्थापक आचार्य अलाउद्दीन खां साहब से संगीत की शिक्षा प्राप्त की थी। पिता के ही सान्निध्य में सरोद वादन की बारीकियों से रूबरू हुई। पिताजी की एक बात जब तक सुर पर काम नहीं होगा, तब तक बेहतर संगीत की प्रस्तुति नहीं हो सकती, हमेशा याद रही। गुरु तुल्य पिता से तालिम हासिल करने के बाद मैंने मैहर घराने के उस्ताद आशीष खां साहब, बहादुर खां साहब आदि गुरुओं से विधिवत शिक्षा प्राप्त की। पिता के साथ पटना के आइएमए हॉल में जीवन में पहली बार संगत करने का पहला मौका मिला। आज भी अपने गुरु की बातों को आत्मसात करने के साथ कॉलेज की छात्राओं को संगीत की तालिम देने में लगी हूं।

प्रो. रीता दास, सरोद वादक

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