Bihar Police: 28 वर्ष लगे महिलाओं को ये मुकाम पाने में, हर सफलता के साथ जुड़ी है कई प्रेरक कहानियां

जब बेटियां कुछ बन जाने का हठ ठान लेती हैं और रास्ते में आने वाली रुकावटों को काटकर आगे बढ़ती ही जाती हैं तो ऐसे मंजर सामने आते हैं और नारी सशक्तीकरण के प्रतीक बनते हैं। पिछले दिनों बिहार में सब इंस्पेक्टर बनीं 596 बेटियां इसी का प्रमाण हैं।

Sanjay PokhriyalSat, 18 Sep 2021 01:28 PM (IST)
आधी आबादी के इस दम को सलाम करती प्रशांत सिंह की रिपोर्ट ...

पटना, प्रशांत सिंह। दर्प से चमकता चेहरा और आवाज में स्वाभिमान भरी खनक। इन सबके पीछे वह जुनून, जिसने उनके सपनों को मुस्कान दी। बात बड़ी इसलिए है, क्योंकि अधिसंख्य ने उन गांव-कस्बों में ही रहकर सफलता की उड़ान भरी, जहां बड़े शहरों की तरह हर सुविधा नहीं मौजूद थी। यह सफलता संकेत है बदलते समाज का, जहां बेटियों की सीमाएं चूल्हे-चौके, चूड़ी-बिंदी और डोली से कहीं आगे हैं। बदलाव का यह सफर कोई एक दिन का नहीं है, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी बदलती सोच ने जैसे आने वाली उम्मीदों का रंग और गहरा कर दिया हो। वह साल 1994 था, जब बिहार में 1640 दारोगा की बहाली में सिर्फ 53 महिलाएं थीं।

यह साल 2021 है, जब 1586 पदों में 596 पर महिलाएं काबिज हुईं। इसमें बिहार सरकार की भी बड़ी भूमिका रही, जिसमें आधी आबादी को सशक्त करने की परिकल्पना के साथ महिलाओं के लिए 35 फीसद का आरक्षण भी तय किया गया, पर उससे भी आगे बढ़कर इन लोगों ने 37 फीसद पदों पर कब्जा जमा लिया। यह यूं ही नहीं था, हर एक की सफलता के साथ प्रेरक कहानी जुड़ी है।

मां के साथ सोफिया- जागरण

सोफिया के सपनों पर नहीं लगी बंदिश: यह बदलाव की नई बयार है कि आज बेटियां कानून की रखवाली के लिए बेखौफ निकल पड़ी हैं। छह बहनों व दो भाइयों के बीच सबसे छोटी सोफिया कैमूर जिले के कुदरा की रहने वाली हैं। पिता मो. सलीम अंसारी का 2016 में इंतकाल हुआ तो जैसे सोफिया के सपने टूटने लगे, पर फैक्ट्री में काम करने वाले बड़े भाई मो. सलील अंसारी ने संबल दिया। यह बदलते समाज की सोच थी, जहां बहन के सपनों पर बंदिश नहीं लगी। सोफिया कहती हैं, गृह प्रखंड के ही सरकारी स्कूल-कालेज में पढ़ाई की। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, किसी बड़े शहर में जाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। वर्ष 2010 में नौवीं कक्षा में थी तो सरकार की बेटियों के लिए योजना के तहत साइकिल मिल गई। स्कूल का सफर आसान हो गया। वर्ष 2011 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक पास करने पर सरकार से दस हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि मिली। इसके बाद मुड़कर नहीं देखा, आज दारोगा भी बन गई।

रंजना गुप्ता व पूजा गुप्ता पिता उदय कृष्ण व माता विमला गुप्ता के साथ- जागरण

बढ़ाया पिता का मान: बेशक परिवार में चाहत एक बेटे की रही और घर में बेटियां ही बेटियां हो गईं, लेकिन बेटियों ने समाज की लीक को तोड़ा। उन पर जल्दी से जल्दी विवाह के लिए दबाव बना, लेकिन उन्होंने अपने आजाद वजूद को चुना। रिटायर बैंक मैनेजर उदय कृष्ण और विमला गुप्ता के परिवार की झोली में ईश्वर ने पांच बेटियां डाल दीं, लेकिन आज पटना के आशियाना नगर के निकट बैंक आफ इंडिया हाउसिंग कालोनी स्थित उनके घर की रौनक देखते ही बनती है। इनकी दो बेटियां रंजना गुप्ता व पूजा गुप्ता एक साथ दारोगा बनीं। रंजना पांच बहनों में तीसरे नंबर पर और पूजा सबसे छोटी हैं। सबसे बड़ी बहन सुरभि की शादी हो गई है, वह मुजफ्फरपुर शेल्टर होम में काउंसलर हैं। दूसरी बहन वंदना गुप्ता पटना के गायघाट स्थित उत्तर रक्षा गृह की अधीक्षक और तीसरी बहन रूपा गुप्ता भुवनेश्वर से शिक्षण में पीएचडी कर रही हैं। रंजना कहती हैं, वह थाने में प्रताड़ना की शिकायत लेकर आने वाली महिलाओं को बताएंगी और समझाएंगी कि वे अपनी शक्ति को पहचानें।

निधि व प्रगति- जागरण आर्काइव

रूढ़ियों को तोड़ बनाई राह: आत्मसम्मान के साथ-साथ खड़ी इन युवतियों की कहानियां न केवल परिवर्तन का एक बड़ा संदेश देती हैं, बल्कि इनके हौसले और जज्बे के आगे हजारों लोग नतमस्तक हो जाते हैं। बेगूसराय से 12 किलोमीटर दूर बाघा गांव की निधि ने उन रूढ़ियों को तोड़ा, जिनके साथ समाज चलता आया है। वह बताती हैं कि जब 13-14 साल की हुई तो पढ़ाई की नहीं, बल्कि दो बड़ी बहनों की तरह उनकी भी जल्दी से जल्दी शादी की बात होने लगी। किसी तरह परिवार को मनाया। घर से चार-पांच किमी. दूर विष्णुपुर गांव के उमर गल्र्स हाईस्कूल में दाखिले व आने-जाने में काफी बाधा आई। रोजाना पैदल आना-जाना संभव नहीं था तो पिता से साइकिल के लिए आग्रह किया। पिता नहीं माने तो मां के जरिए उन्हेंं राजी करवाया। वर्ष 1997 में आठवीं कक्षा में थी तब साइकिल दिलाई गई। खास बात यह इस तरह वह गांव में साइकिल चलाने वाली पहली लड़की बन गईं। हालांकि समाज के ताने भी सुनने पड़े।

वर्ष 1999 में मैट्रिक परीक्षा के 10 दिन पहले मां सुंदर देवी का निधन हो गया। इस पर घरवालों ने कहा कि परीक्षा छोड़ दो, पर उन्हें मां के सपनों को पूरा करना था। उन्होंने विपरीत स्थितियों में परीक्षा दी और द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हो गई। बहुत समझाने के बाद पिता रामसुंदर साह ने बेगूसराय के महिला कालेज में दाखिला करा दिया। गांव से 12 किमी. दूर साइकिल से ही कालेज आने-जाने लगी। इंटर और ग्रेजुएशन दोनों प्रथम श्रेणी से पास कर दिखाया। बीपीएससी की परीक्षा में महज दो अंकों से चूक गईं। पांच साल छोटी बहन प्रगति कुमारी भी ग्रेजुएशन कर चुकी थीं। वर्ष 2018 में दारोगा के लिए रिक्तियां निकलीं। उन्होंने भी साथ में फार्म भरा। संयोग से दोनों बहनें साथ चयनित हो गईं। इससे परिवार और समाज का नजरिया बदल गया। पिता ने जब कहा कि आज तक खानदान में किसी ने सरकारी नौकरी नहीं की, बेटियों ने वह कर दिखाया तो आंखें भर आईं। हालांकि गांव की फिजां भी बदल चुकी थी। काफी लड़कियां साइकिल से स्कूल जाने लगी थीं। समाज की सोच में आए बदलाव के कारण छोटी बहन प्रगति के लिए राह थोड़ी आसान हो गई थी।

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