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जानकारी के अभाव में बर्बाद हो रही एंटीजन रैपिड किट

पटना। कोरोना जांच की संख्या बढ़ाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने आरटीपीसीआर (रियर टाइम पॉलीमरेज चेन रिएक्शन), ट्रूनैट और रैपिड किट तीन तरह की टेस्टिंग की व्यवस्था की है। हालांकि, सैंपल ले रहे स्वास्थ्यकर्मियों को इस बात की जानकारी नहीं दी गई कि किस तरह के रोगी की जांच किस विधि से करनी है। नतीजा, न केवल रैपिड किट बर्बाद हो रही है बल्कि ट्रूनैट विधि से जांच के प्रभावी परिणाम नहीं आ रहे हैं। इसकी सूचना मिलने पर सिविल सर्जन डॉ. राजकिशोर चौधरी ने फटकार लगाते हुए उन्हें तीनों जांचों की विधियों में अंतर समझाया।

अत्यधिक वायरल लोड होने पर ही रैपिड किट देगी पॉजिटिव :

सोमवार को जिन अस्पतालों में एंटीजन रैपिड किट से जांच की गई तो लगातार निगेटिव रिपोर्ट देखकर स्वास्थ्यकर्मी चौंके। किट खराब है सोच कर अधिकारियों से बात की गई तब पता चला कि जिन रोगियों में वायरल लोड अधिक होगा यानी जो लोग संक्रमित हैं उन्हीं की रिपोर्ट पॉजिटिव आएगी बिना लक्षण वाले लोगों की नहीं। इसलिए इसका उपयोग उन कंटेनमेंट जोन में किया जाना है, जहां अत्यधिक लोगों के पॉजिटिव होने की आशंका हो। इस किट के पॉजिटिव का ही अर्थ है, इसकी निगेटिव रिपोर्ट का कोई मतलब नहीं है। जो माइल्ड पॉजिटिव होंगे, उनकी रिपोर्ट भी निगेटिव ही आएगी।

ट्रूनैट विधि से मिलता कंफर्म निगेटिव :

ट्रूनैट विधि ऐसे रोगियों के लिए उपयोगी है जिनमें लक्षण नहीं हैं लेकिन संपर्क में आए हैं। इससे आई निगेटिव रिपोर्ट कंफर्म होती है लेकिन पॉजिटिव रिपोर्ट की पुष्टि के लिए दोबारा सैंपल की आरटीपीसीआर विधि से जांच कराई जाती है।

आरटीपीसीआर विधि में भी 30 प्रतिशत गलत रिपोर्ट की आशंका :

अभी तक कोरोना जांच की सबसे प्रभावी विधि आरटीपीसीआर को माना जाता है। हालांकि, इसमें भी करीब 30 प्रतिशत रिपोर्ट गलत आने की आशंका रहती है। ऐसे में ये 30 प्रतिशत लोग जिनकी रिपोर्ट निगेटिव आई है वे दूसरों को संक्रमित कर सकते हैं।

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