बिहार सरकार के अधिकारी पटना में बेचने लगे सब्‍जी, बाजार से डेढ़ गुनी कीमत पर भी मिल रहे खरीदार

सचिवालय के पास कृषि विभाग बेच रहा सब्‍जी। जागरण

किसान खुश सरकारी तराजू दे रहा हक कृषि विभाग की पहल से जैविक खेती करने वाले किसानों को मिल रहा वाजिब दाम अधिकारी खुद बेच रहे सब्जी सचिवालय स्थित काउंटर से शुरुआत सरकार की इस पहल से किसानों को हो रहा लाभ

Publish Date:Sat, 23 Jan 2021 12:33 PM (IST) Author: Shubh Narayan Pathak

पटना [नीरज कुमार]। किसान सब्जी उगा रहे और अधिकारी तौल रहे। समन्वय का फायदा यह कि इस सरकारी तराजू पर किसानों का पलड़ा भारी है। उन्हें वाजिब दाम मिल जा रहा है, वह भी अगले ही दिन। सब्जी बेचने का जिम्मा कृषि विभाग के पास, सो अधिकारियों ने तराजू उठा लिया है। इसकी शुरुआत हुई है पटना स्थित सचिवालय से, जहां प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को काउंटर लगाया जाता है। कृषि विभाग के अधिकारी और कर्मी दुकानदार की भूमिका में होते हैं। यह प्रयोग शीघ्र ही अन्य जिलों में भी किया जाएगा।

बाजार से करीब डेढ़ गुना है जैविक सब्जियों की कीमत

खास बात यह कि जैविक खाद से उत्पादित सब्जी बाजार से 50-60 फीसद अधिक दर पर बेची जा रही है, पर लोग इसे पसंद कर रहे हैं। राजधानी में मटर अभी 25 रुपये किलो है, जबकि सचिवालय स्थित काउंटर पर जैविक मटर 40 रुपये किलो। इसका सीधा लाभ किसानों को मिल रहा है। बेची गई सब्जी की राशि किसानों को अगले दिन ही दे दी जाती है। इस समय राज्य में 18,060 किसान जैविक सब्जी का उत्पादन कर रहे हैं। इसकी बिक्री कृषि विभाग की बिहार स्टेट सीड एंड आर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी कर रही है। पटना में 10 क्विंटल से अधिक सब्जी बेची जा चुकी है, जिसमें मटर, ब्रोकली, बैगन, टमाटर, मूली, फूल व पत्तागोभी और मशरूम प्रमुख हैं।

13 जिलों के किसान कर रहे जैव‍िक खेती

एजेंसी के निदेशक सुनील कुमार पंकज ने कहा कि अभी 13 जिलों के किसान जैविक खेती कर रहे हैं। इनमें बक्सर, भोजपुर, पटना, सारण, वैशाली, समस्तीपुर, मुंगेर, खगडिय़ा, भागलपुर, कटिहार, नालंदा, बेगूसराय और लखीसराय शामिल है। कृषि विभाग ने पटना के फतुहा में जैविक फॉर्म विकसित किया है। यहां विभाग स्वयं जैविक सब्जी का उत्पादन कर रहा है। विभाग की पहल पर 13 हजार एकड़ में जैविक सब्जी की खेती हो रही है।

कृषि विभाग के जैविक खेती के प्रभारी वेंकटेश नारायण सिंह ने बताया कि जैविक सब्जी की खेती कृषि विज्ञानियों की देखरेख में की जा रही है। इसमें केवल गोबर की खाद और कीटनाशी के रूप में गोमूत्र एवं नीम की पत्ती से तैयार घोल का उपयोग किया जाता है।

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