Bihar Politics: जातिगत राजनीति का बोलबाला, उत्तराधिकारी पर निर्भर नफा-नुकसान

परिवार की पार्टी- परिवार का नेतृत्व वाली प्रवृत्ति वाले सिर्फ रामविलास पासवान या लालू प्रसाद ही नहीं हैं। महज सात साल वाली पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी हम (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा) में भी उत्तराधिकारी के रूप में उनके पुत्र संतोष मांझी को तैयार किया जा रहा है

Sanjay PokhriyalSat, 24 Jul 2021 10:33 AM (IST)
जदयू के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा। जागरण

पटना, आलोक मिश्र। जातिगत जनगणना को लेकर भले ही राजनीतिक दलों के मत अलग-अलग हों, लेकिन वर्तमान में जातिगत राजनीति का ही बोलबाला है। सत्ता प्राप्ति के लिए जातिगत समीकरणों पर ही ज्यादा भरोसा किया जाता है। इसलिए जातिगत राजनीति से उपजे नेताओं और उनके द्वारा गठित राजनीतिक दलों में उत्तराधिकारी अधिकतर परिवार से उपजते हैं। जहां ऐसा नहीं होता वहां उत्तराधिकार का संकट हमेशा ही बना रहता है, क्योंकि नेतृत्व के नीचे कोई बेल पनपने ही नहीं पाती। बिहार में जदयू (जनता दल यूनाइटेड) फिलहाल ऐसी ही दुविधा से ग्रस्त है, जिसमें नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन को लेकर माथापच्ची जारी है।

जदयू में सर्वेसर्वा बनकर स्थापित हो चुके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार संगठन में अपने उत्तराधिकारी की तलाश कर रहे हैं। नीतीश कुमार अपवाद हैं कि उन्होंने कभी भी अपने स्वजनों को न तो राजनीति में सक्रिय किया और न ही चुनाव या पिछले दरवाजे से सदन में भेजा। उनके साथ संयोग भी जुड़ा कि उनके पुत्र और भाई की राजनीति में रुचि ही नहीं रही और न ही कुटुंब के लोग इधर-उधर परिचय देकर लाभ लेने की कोशिश करते नजर आए। नीतीश ने संगठन के उत्तराधिकारी के तौर पर अपने भरोसेमंद राज्यसभा सदस्य आरसीपी सिंह को जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया।

आइएएस रहे आरसीपी, कुर्मी वोटबैंक की राजनीति करने वाले नीतीश के 23 साल पुराने सहयोगी हैं, उनके गृह जिले नालंदा से हैं, इसलिए सबसे ज्यादा भरोसा उन्हीं पर किया। अब आरसीपी सिंह केंद्रीय कैबिनेट में शामिल हो गए हैं। जदयू की एक व्यक्ति, एक पद की नीति के अनुसार आरसीपी चूंकि एक ही पद पर रह सकते हैं इसलिए उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ेगा। माना जा रहा है कि इस महीने के अंत में बुलाई जा रही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नए अध्यक्ष पर निर्णय हो सकता है।

जदयू का संकट यही रहा कि उसमें आरसीपी के अलावा जातिगत समीकरणों में फिट बैठने वाला कोई भी ऐसा नेता नहीं पनपा जो उनकी जगह ले सके। इसलिए फिलहाल हाल ही में पार्टी में शामिल हुए नीतीश के पुराने साथी उपेंद्र कुशवाहा के नाम की चर्चा सबसे आगे है। वह जदयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। उपेंद्र का नीतीश से रिश्ता लोकदल के समय से है। इसे कैलेंडर के हिसाब से वर्ष 1985 से मान सकते हैं। यह रिश्ता इस बीच लगभग आठ वर्षो तक टूटा रहा। पिछले विधानसभा चुनाव में उपेंद्र की पार्टी रालोसपा (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी) भी उतरी थी, लेकिन एक भी सीट नहीं ला पाई। अलग दल बनाकर कोई राजनीतिक लाभ न उठा पाने वाले उपेंद्र चुनाव बाद नीतीश के साथ आ गए और संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बना दिए गए। लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण के तहत उपेंद्र, नीतीश के हर समीकरण में फिट बैठते हैं। इसलिए इन पर नीतीश दांव लगा सकते हैं।

कुशवाहा वोटों को साधने के लिए उपेंद्र कुशवाहा के पार्टी में शामिल होने से पहले उमेश कुशवाहा को जदयू का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर लव-कुश समीकरण साधने की कोशिश की गई, लेकिन अब आरसीपी के स्थान पर उपेंद्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद प्रदेश में भी फेरबदल हो सकता है और वहां किसी कुर्मी नेता को बैठाया जा सकता है, क्योंकि दोनों पदों पर कुशवाहा को नहीं रखा जा सकता। इधर लोकसभा में जदयू संसदीय दल के नेता राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह का नाम भी राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए चर्चा में आ रहा है। अगर ऐसा होता है तो यह जातिगत समीकरणों से इतर लिया गया एक ऐसा फैसला होगा, जिसमें नफा-नुकसान दोनों समाहित होंगे।

हालांकि राजनीतिक विरासत परिवार में देना भी कम कठिन नहीं है। लोजपा के संस्थापक रहे रामविलास पासवान ने इसे भांप लिया था। पुत्र चिराग पासवान 2014 में पहली बार सांसद बने। उन्हें संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया गया। उसके पांच साल बाद वे लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने गए। लेकिन रामविलास पासवान के आंख मूंदते ही उनके भाई -भतीजों की आंखें खुल गईं। नतीजा सबके सामने है। पार्टी दो हिस्से में बंट गई और चिराग अकेले पड़ गए। अभी माना जा रहा है कि राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद बड़ी आसानी से अपने पुत्र तेजस्वी यादव को पार्टी की कमान सौंप देंगे। असर की बात बाद में होगी, लेकिन पुत्री डा. मीसा भारती की राजनीतिक महत्वाकांक्षा सुस्त पड़ी रहेगी, इसके बारे में अभी कुछ कहना मुश्किल है।

परिवार की पार्टी- परिवार का नेतृत्व वाली प्रवृत्ति वाले सिर्फ रामविलास पासवान या लालू प्रसाद ही नहीं हैं। महज सात साल वाली पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी हम (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा) में भी उत्तराधिकारी के रूप में उनके पुत्र संतोष मांझी को तैयार किया जा रहा है और बमुश्किल तीन साल पुरानी वीआइपी (विकासशील इंसान पार्टी) के संस्थापक मुकेश सहनी भी अपने भाई को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार कर रहे हैं।

[स्थानीय संपादक, बिहार]

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