बिहार में लालू की अपराजेय सत्ता की ललन ने तय कर दी थी विदाई, संकेतों से समझ लेते हैं नीतीश का मन

ललन सिंह की राजनीति की शुरुआत जननायक कर्पूरी ठाकुर के सानिध्य में हुई। कर्पूरी के जीवन काल में ही वे नीतीश कुमार के करीब आए। 40 साल से अधिक समय से यह करीबी कायम है। दोनों ने हमेशा एक दूसरे के संकेतों को समझा।

Akshay PandeySat, 31 Jul 2021 08:59 PM (IST)
नीतीश कुमार, ललन सिंह और लालू प्रसाद यादव। जागरण आर्काइव।

राज्य ब्यूरो, पटना: जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह ऊर्फ ललन सिंह की राजनीति की शुरुआत जननायक कर्पूरी ठाकुर के सानिध्य में हुई। कर्पूरी के जीवन काल में ही वे नीतीश कुमार के करीब आए। 40 साल से अधिक समय से यह करीबी कायम है। बीच के एकाध वर्ष को छोड़ दें तो दोनों ने हमेशा एक दूसरे के संकेतों को समझा। 2000 में जब नीतीश कुमार की पहली सरकार बहुमत के लिए विधायकों की अपेक्षित संख्या नहीं जुटा पा रही थी, ललन सिंह ने सरकार बचाने की हरसंभव कोशिश की। सरकार नहीं बच पाई। लेकिन, ललन सिंह की कोशिशें कमजोर नहीं हुईं। पशुपालन घोटाला, जो अंतत: लालू प्रसाद की अपराजेय समझी जानेवाली सत्ता की विदाई का कारण बना, उस घोटाला को उजागर करने में ललन सिंह की भूमिका से भला कौन इनकार कर सकता है। विरोधी भी मानते हैं कि लक्ष्य तय करने के बाद उसे हासिल करने के लिए ललन सिंह कठोर श्रम करते हैं। 

निजी आकांक्षा नहीं

ललन सिंह पहला चुनाव 19 साल की उम्र में जीते। वह भागलपुर के टीएनबी कालेज छात्रसंघ का चुनाव था। 1974 में वे इसके महासचिव बने। दूसरा चुनाव 2004 में लोकसभा का था। वे लड़े और जीते। इससे पहले 2000 में जदयू ने उन्हें राज्यसभा में भेज दिया था। 2004 से पहले वह विधानसभा या लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं बने। उम्मीदवार बनना उनके लिए आसान था। समता पार्टी या जदयू के टिकट बंटवारा में नीतीश कुमार हमेशा उनकी राय को तरजीह देते रहे हैं। वह समता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष जार्ज फर्नांडीस के भी करीबी रहे। कह सकते हैं कि यह वह दौर था, जिसमें ललन सिंह मंच से अधिक नेपथ्य में सक्रिय रहते थे। 

आश्वासन में भरोसा नहीं

कुछ भी आश्वासन देकर तत्काल वाहवाही लेने की आम नेताओं की प्रवृत्ति से ललन सिंह अलग हैं। करीबी बताते हैं कि चाहें चुनावी मंच हो या व्यक्तिगत बातचीत, ललन सिंह न पूरा होने लायक आश्वासन नहीं देते हैं। हां, अगर आश्वासन दे दिया तो उस पर अमल करने से कभी नहीं पीछे हटते। यही वजह है कि चालू-पूर्जा किस्म के नेता-कार्यकर्ता उनके करीब नहीं फटकते। जमीनी कार्यकर्ताओं की पहचान की सलाहियत के चलते उनके नेतृत्व में प्रदेश में जदयू का विकास हुआ। 

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