top menutop menutop menu

यूं ही नहीं कहा था-जब तक रहेगा समोसे में आलू , तब तक रहेगा बिहार में लालू

यूं ही नहीं कहा था-जब तक रहेगा समोसे में आलू , तब तक रहेगा बिहार में लालू
Publish Date:Wed, 04 Dec 2019 09:59 AM (IST) Author: Kajal Kumari

पटना, राज्य ब्यूरो। अपनी राजनीति के उफान के समय राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कभी मजाक में ही कहा था कि जब तक समोसे में आलू रहेगा, तब तक बिहार में लालू रहेगा। तब यह नारा बिहार के बाहर भी सुना गया था। आज उस दौर को गुजरे जमाना हो गया, लेकिन नारे का संदेश कहीं न कहीं आज भी जिंदा है।

अभी लगभग दो साल से जेल में रहने के बावजूद लालू प्रदेश के सियासी पटल से आज भी ओझल नहीं हुए हैं। राजनीतिक गलियारे में किसी न किसी रूप में न सिर्फ आज भी उनकी चर्चा है, बल्कि पिछले लोकसभा चुनाव में तो उन्होंने जेल में रहकर ही विपक्ष की मोर्चाबंदी का पूरा ताना-बाना भी बुना। हां, इतना जरूर है कि मोदी-नीतीश के जलवे के सामने विपक्ष की मोर्चाबंदी धराशायी हो गई, लेकिन लालू ने अपनी प्रासंगिकता बरकरार रखी है। 

राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर लालू प्रसाद का 11 वां कार्यकाल इस महीने की 10 तारीख से शुरू होगा। अध्यक्ष पद के लिए मंगलवार को उनका नामांकन हुआ। मुकाबले में कोई नहीं है। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और दूसरे कई नेता इसे परिवारवाद की पराकाष्ठा मानते हैं।

इस पर पार्टी के विधायक शिवचंद्र राम कहते हैं कि लालू प्रसाद ताउम्र हमारे अध्यक्ष रहेंगे। परिवारवाद के नाम पर लालू प्रसाद की आलोचना होती है। हालांकि वह क्षेत्रीय दलों के अकेले नेता नहीं हैं,  जिन्होंने पार्टी बनाई और परिवार से बाहर के किसी को शीर्षस्थ पद पर नहीं बैठने दिया।

इतना जरूर है कि वह इस लिहाज से अकेले हैं कि लगातार करीब 30  साल तक बिहार की राजनीति उनके पक्ष या विपक्ष में ही घूमती रही। वर्तमान की साझी सरकार में संक्षिप्त भागीदारी को छोड़ दें तो बिहार की सत्ता से करीब 12 वर्षों तक अलग रहने के बावजूद लालू के बिना बिहार की राजनीतिक चर्चा आगे नहीं बढ़ पाती है।

करीब तीन दशकों से राज्य के हर चुनाव में लालू की मौजूदगी बनी हुई है। अभी छह माह पूर्व लोकसभा चुनाव के समय वह जेल में थे। बावजूद इसके उन्होंने विपक्ष की दशा-दिशा तय करने, ट्विटर आदि के जरिये संदेश देने में पूरी सक्रियता दिखाई।

सबसे बड़ी बात है कि सत्तारूढ़ राजग के लिए भी लालू अभी तक पूरी तरह प्रासंगिक बने हुए हैं। चाहे प्रधानमंत्री हो या मुख्यमंत्री या फिर राजग का कोई अन्य नेता, अपनी चुनावी सभाओं में सबने किसी न किसी रूप में लालू या उनके शासनकाल का उल्लेख जरूर किया।

 1995 का विधानसभा चुनाव जनता दल के नाम से लड़ा गया था। 1997 में राजद बना। उसके बाद अब तक  विधानसभा के पांच चुनाव हुए। इन चुनावों में राजद का वोट बैंक 18 से 28 फीसदी के बीच रहा। 2010 के विधानसभा चुनाव में राजद के वोट फीसद (18.84) में काफी गिरावट आई और उसे सिर्फ 22  सीटें मिलीं। तब राजद की समाप्ति की घोषणा की जाने लगी थी। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू के साथ मिलकर राजद ने शानदार वापसी की और सत्ता में साझीदार भी बना। इसी प्रकार पिछले लोकसभा चुनाव में शून्य पर सिमटने के बाद अभी हाल ही में पांच विधानसभा क्षेत्रों के हुए उपचुनाव में दो सीट जीत कर राजद ने अपना जनाधार कायम रहने का संकेत दिया।

------

इनसेट ::

------

कुछ यों सिमटता गया जनाधार

1990 से शुरू मंडलवादी राजनीति के केंद्र में लालू प्रसाद ही रहे हैं। उन्होंने समाज के उस हिस्से को जागरूक किया, जिसे वोट की ताकत का अहसास नहीं था। अत्यंत पिछड़ी जातियों का यह हिस्सा बहुत दिनों तक लालू प्रसाद का मुरीद बना रहा। सत्ता में आने के लिए नीतीश कुमार ने इस समूह को अपने साथ जोड़ा। सत्ता में भागीदारी दी। आज की तारीख में यह एनडीए की ताकत है। माना जाता है कि लंबे समय तक मुस्लिम-यादव समीकरण में बंधे रहने के कारण राजद के जनाधार में क्षरण हुआ। इन दोनों सामाजिक समूहों को छोड़कर उसके जनाधार के बाकी हिस्से खिसकते चले गए। भरपाई के लिए राजद ने संगठन में अत्यंत पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का फैसला किया है। सवर्णों को भी पद दिए जा रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता और राजपूत समाज के जगदानंद सिंह को राजद का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। हालांकि यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि राजद इन उपायों के बूते किस हद तक वापसी करता है।

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.