अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस : मंच पर सभी को भोजपुरी से प्यार, फिर भी अष्टम अनुसूची से इन्कार

सियासतदानों की उपेक्षा का शिकार है भोजपुरी। प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

मातृभाषा दिवस पर विशेष नेता हों या बाजार सभी को लुभाती है देश-विदेश में बसे करोड़ों लोगों की भाषा भोजपुरी नई शिक्षा नीति में भी मातृ भाषा को बढ़ावा देने पर जोर बावजूद इसके भोजपुरी को आठवीं अनुसू‍ची में नहीं मिल रही जगह

Shubh Narayan PathakSun, 21 Feb 2021 09:57 AM (IST)

बक्सर, गिरधारी अग्रवाल। International Mother Language Day 2021: मौलिक चिंतन, अनुभव, खोज, अभिव्यक्ति आदि का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। मातृभाषा वह भाषा कहलाती है, जिसे बालक प्रथम बार मां से सुनता है। यह क्षेत्र विशेष की या क्षेत्रीय भाषा भी कही जाती है। चूंकि, बिहार (Bihar) और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के भोजपुरी क्षेत्र की लोक भाषा भोजपुरी (Bhojpuri) है, इसलिए यहां की मातृभाषा भोजपुरी ही है। भोजपुरी देश के अलावा विदेश के 16 देशों में 25 करोड़ से अधिक लोगों के बीच हिंदी के बाद सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा है।

झारखंड में द्वितीय भाषा है भोजपुरी

यही वजह है कि झारखंड सरकार ने भी अपने यहां भोजपुरी को द्वितीय भाषा का दर्जा दे दिया है। हालांकि, बिहार सरकार ने भी 2017 में ही इसे संवैधानिक मान्यता दिए जाने हेतु केंद्र सरकार को लिखा है। इसके बावजूद भोजपुरी मातृभाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है।

मॉरीशस और नेपाल में भोजपुरी का सम्‍मान, अपने देश में उपेक्षा

दर्द इस बात का है कि इससे कम क्षेत्रों व कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली कई क्षेत्रीय भाषाएं संविधान में जगह पा चुकी हैं। भोजपुरी की लोकप्रियता यहां के होने वाले गड़हा महोत्सव, चैता गायन आदि अन्य भोजपुरी सांस्कृतिक आयोजनों में जुटने वाली भीड़ बयां करने को काफी है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सभाओं को धार देने का प्रयत्न भोजपुरी के संबोधन से किया था। बिहार, झारखंड व उत्तर प्रदेश में भोजपुरी भाषियों की अच्छी खासी संख्या है। मॉरीशस, नेपाल सरीखे देश में भी भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है जबकि, अपने ही देश के संविधान में यह उपेक्षित।

लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया में भी भोजपुरी का उल्‍लेख

शिक्षाविद् और भोजपुरी के चर्चित गीतकार श्रीभगवान पांडेय बताते हैं कि भोजपुरी की समृद्धि व क्षमता के विषय में आयरलैंड के अब्राहम ग्रियर्सन की पुस्तक लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया में भी चर्चा की गई है। जिसमें उन्होंने भोजपुरी में प्रशासनिक भाषा होने की क्षमता बताई है। बच्चों की प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। क्योंकि जन्म से ही बच्चा उस भाषा, संस्कृति के परिवेश में पलता बढ़ता है। जिससे उसे किसी भी बात को अनुकरण करने में सहूलियत होगी।

सामाजिक और राजनीतिक उपेक्षा का शिकार

भोजपुरी साहित्य मंडल के महासचिव एवं अध्यक्ष डॉ. अरुण मोहन भारवि एवं अनिल कुमार त्रिवेदी का मानना है कि इसकी दुर्गति सामाजिक, राजनीतिक एवं शैक्षणिक स्तर पर उपेक्षा से हुई है। जबकि, कबीर दास, राहुल सांकृत्यायन, शिवपूजन सहाय, रघुवीर नारायण, मनोरंजन, भिखारी ठाकुर, विप्र, किरण, दुर्गा शंकर नाथ, राम विचार पांडेय, महेंदर मिसिर, भोला नाथ आदि कवियों ने इसे सजाने संवारने में जीवन खपा दिया। सिने जगत में भी इस भाषा का व्यवसायीकरण खूब हो रहा है। नेतागण भोजपुरी भाषा के मुहावरे का प्रयोग अपने भाषण को धार देने के लिए तो करते हैं। लेकिन, जब इसे संविधान की अष्टम सूची में शामिल करने कि बात आती है तो उसे ठंडे बस्ते में डाल देते हैं।

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