Ganga Dussehra: बिहार को बक्‍सर से भागलपुर तक निहाल करती हैं गंगा, यहां जानें पूजा का मुहूर्त और तरीका

Ganga Dussehra in Bihar मां गंगा की विधि-विधान पूर्वक पूजन किए जाने से सभी प्रकार के शोक-दोष का निवारण हो जाता है। इस दिन श्रद्धालु भक्तों को मां गंगा की स्तुति स्तोत्र व उनकी कथा का श्रवण करना चाहिए।

Shubh Narayan PathakSun, 20 Jun 2021 06:20 AM (IST)
बिहार में आज मनाया जा रहा गंगा दशहरा का त्‍योहार। फाइल फोटो

पटना/बक्सर, जागरण टीम। Ganga Dussehra: भारतीय संस्‍कृति के लिहाज से आज का दिन जितना खास है, उतना ही बिहार के अतीत, वर्तमान और भविष्‍य के लिहाज से भी। गंगा के दोनों छोरों पर ही बिहार खूब फल-फूला है। आज बिहार में बक्‍सर से लेकर भागलपुर तक आज उत्‍साह और उमंग का माहौल रहेगा। बहुतेरे गंगा घाटों पर आज स्‍नान के लिए श्रद्धालु उमड़ेंगे। हालांकि कोरोना संक्रमण के खतरे और सरकार की गाइडलाइन को देखते हुए हम अपील करते हैं कि आप भीड़ में जाने से बचें। यहां आपको गंगा दशहरा के मुहूर्त और महात्‍म्‍य की जानकारी मिल जाएगी। प्रशासन और धार्मिक गुरुओं ने भी लोगों से अपील की है कि वे इस बार गंगा दशहरा का त्‍योहार अपने घर पर ही मनाएं और अपनी श्रद्धा प्रस्‍तुत करने के लिए घर पर मौजूद गंगाजल से ही पूजा-अर्चना करें।

शनिवार की शाम से ही दशमी तिथि प्रारंभ

आचार्य मुक्तेश्वर नाथ शास्त्री ने बताया कि दशमी तिथि शनिवार की शाम 6 बजकर 50 मिनट पर ही प्रवेश कर गई है। जो आज रविवार को अपराह्न 4 बजकर 25 मिनट तक रहेगी। धर्म शास्त्रों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जेठ महीने के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि में ही मां गंगा का धरती पर अवतरण राजा भगीरथ के प्रयास से हुआ था। इस दिन मां गंगा की विधि-विधान पूर्वक पूजन किए जाने से सभी प्रकार के शोक-दोष का निवारण हो जाता है। इस दिन श्रद्धालु भक्तों को मां गंगा की स्तुति, स्तोत्र व उनकी कथा का श्रवण करना चाहिए। कोरोना काल में घर में रखे गंगाजल से भी आप अपनी श्रद्धा पूरी कर सकते हैं।

गंगा की महिमा वेदों से लेकर साहित्य तक

गंगा की महिमा का वर्णन वेदों से लेकर वर्तमान तक के साहित्य में भरा पड़ा है। कहते हैं कि ऋषि-महर्षियों ने गंगा के पावन तट पर ही समाधिस्थ हो वेदों का साक्षात्कार किया था। जिन्होंने दर्शन शास्त्र के रहस्यों को खोला और उपनिषदों की निर्गुण अनुभूति की अभिव्यंजना की। शिक्षाविद श्रीभगवान पांडेय का कहना है की गंगा जल को वर्षों रखने पर भी विकृत न होने और कीड़े आदि का उत्पन्न नहीं होना इसके जल की विलक्षण विशेषता है। समझ होने के बावजूद जहां माता गंगा को लोग पूजते हैं वहीं कुछ लोग इसकी आंचल को मैली कर रहे हैं, जहां अपने कचरे को नदी में बहा दे रहे हैं।

ऐसे हुआ था गंगा का अवतरण

धार्मिक कथा प्रसंग के अनुसार कहा जाता है की प्रतापी राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों को जीवन मरण के दोष से मुक्त करने तथा गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या की थी। जिनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता गंगा ने भगीरथ से कहा, मेरे इस प्रचंड प्रवाह को सहना पृथ्वी के लिए कठिन होगा, अत: तुम भगवान शंकर को प्रसन्न करो। आगे प्रसंग में बताया गया है की भगीरथ की घोर तपस्या से भगवान शंकर प्रसन्न हो जाते हैं और गंगा जी के प्रवाह को जटा में धारण कर उसे पृथ्वी पर छोड़ते हैं। 

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