इस ताइवानी रेड लेडी को ले दीवानगी देखनी हो तो आइए बिहार, कारण जान चौंक जाएंगे आप

बक्सर [कंचन किशोर]। ताइवान की 'रेड लेडी' को ले दीवानगी देखनी हो तो बिहार के बक्‍सर स्थित डुमरांव अनुमंडल के नया भोजपुर में आइए। नाम से चौंकिए नहीं, यह 'रेड लेडी' पपीते की एक ताइवानी प्रजाति है, जिसकी खेती स्‍थानीय किसान कर रहे हैं। इस प्रजाति के पपीते खेतों में ही हाथों-हाथ बिक जा रहे हैं। मांग को देखते हुए किसान नर्सरी भी तैयार कर  रहे हैं। इन तैयार पौधों को लेने उत्‍तर प्रदेश (यूपी) और झारखंड के किसान आते हैं।

चार साल पहले शुरू की खेती

बक्‍सर के डुमरांव का असिंचिंत क्षेत्र आमतौर पर सब्जियों की खेती के लिए जाना जाता है। नया भोजपुर गांव निवासी व किसान सम्मान योजना में सम्मानित हो चुके प्रगतिशील किसान आशुतोष पांडेय ने क्षेत्र में पपीते की खेती की अच्छी संभावना जगाई है। उन्‍होंने चार साल पहले खुद खेती शुरू की। अब उनकी प्रेरणा से और किसान भी इससे जुड़ गए हैं।

दूसरे राज्‍यों में पौधों की आपूर्ति

आशुतोष बताते हैं कि उन्‍होंने पहले पांच कट्ठा में प्रयोग के तौर पर 'रेड लेडी' प्रजाति के पौधे लगाए। प्रति पेड़ 60 किलो फल आए और खर्च काटकर सवा लाख रुपये का मुनाफा हुआ। उन्हें महंगे पौधे खरीदने पड़े, इसलिए मुनाफा कम हुआ। पिछले तीन सालों से वे पौधे भी तैयार कर रहे हैं। प्रति पौधे 20 रुपये की दर से उत्‍तर प्रदेश (यूपी) व झारखंड अादि दूसरे प्रदेशों तक आपूर्ति कर रहे हैं।

प्रति एकड़ 10 लाख का मुनाफा

आशुतोष कहते हैं कि पपीते की खेती करने वाले किसानों को बाजार ढूंढऩा नहीं पड़ता और फसल खेत में ही बिक जाती है। उनके अलावा कई किसानों ने बड़े स्तर पर इसकी खेती की है और प्रति एकड़ सालभर में 10 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा रहे हैं।

एक दर्जन अन्‍य किसान भी कर रहे खेती

आशुतोष के अलावा बक्‍सर के एक दर्जन अन्‍य किसानों ने भी बड़े स्तर पर उन्नत पपीते की खेती की है। सिमरी के नागेन्द्र पांडेय, डुमरांव के प्रकाश राय, नया भोजपुर के वीरेन्द्र कुशवाहा आदि ने अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर ली है। इन किसानों का कहना है कि 'रेड लेडी' प्रजाति के पपीते के पौधे को लगाने के बाद इसकी ज्यादा देखरेख नहीं करनी पड़ती है।

ताइवान में हुआ विकास

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. देवकरण बताते हैं कि 'रेड लेडी' पपीते की एक उन्नत प्रजाति है। ताइवान स्थित एशियन फल-सब्जी अनुसंधान केंद्र में इस प्रजाति के विकसित होने के कारण इसे ताइवानी पपीता कहा जाता है। साल में दो बार फरवरी-मार्च और सितंबर-अक्टूबर में इसका पौधा रोपने का सही समय होता है। प्रति कट्ठा 40 पौधे लगाए जा सकते हैं और हर छह महीने में लगभग 30-30 किलो फल दो बार आता है। 15 रुपये प्रति किलो के हिसाब से गणना करने पर एक कट्टे में ही किसानों को खर्च काटकर करीब 30 हजार रुपये बच जाते हैं।

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