बिहारः कैग की रिपोर्ट में 1336 करोड़ की राजस्व क्षति का पर्दाफाश, पकड़ी गईं कई तरह की गड़बड़ियां

कैग की रिपोर्ट में कई तरह की गड़बड़ियां सामने आई हैं। दावा किया गया है कि राज्य सरकार को एक हजार 336 करोड़ की राजस्व क्षति हुई है। 31 मार्च 2019 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए सामान्य सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में पर्याप्त सुधार की गुंजाइश है।

Akshay PandeyThu, 29 Jul 2021 10:47 PM (IST)
कैग की रिपोर्ट में कई तरह की गड़बड़ियां सामने आई हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर।

राज्य ब्यूरो, पटना : महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट गुरुवार को सदन पटल पर रखी गई, जिसमें कई तरह की गड़बड़ियां सामने आई हैं। दावा किया गया है कि राज्य सरकार को एक हजार 336 करोड़ की राजस्व क्षति हुई है। 31 मार्च 2019 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए सामान्य, सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र में पर्याप्त सुधार की गुंजाइश बताई गई है। बाद में महालेखाकार राम अवतार शर्मा ने प्रेस कान्फ्रेंस कर बताया कि कैग ने अप्रैल 2018 से फरवरी 2020 तक कुल 629 मामलों की छानबीन की गई। इसमें सरकार को 3658.11 करोड़ राजस्व की हानि सामने आई। हालांकि संबंधित विभागों ने 1648 मामलों में 1336.65 करोड़ रुपये की क्षति एवं अन्य तरह की कमियां स्वीकार की। 

इसके पहले महालेखा परीक्षक राकेश मोहन ने बताया था कि बिहार में सही तरीके से बजट नहीं बनाया जा रहा है। आकार तो प्रत्येक साल बढ़ जाता है, लेकिन उस हिसाब से राशि खर्च नहीं होती है। 60-70 फीसद राशि ही खर्च हो पाती है।  रिपोर्ट के मुताबिक पौधारोपण में भी गड़बड़ी हुई। बेमौसम पौधारोपण से पौधे सूख गए और सरकार के 164.98 करोड़ रुपये बर्बाद हो गए। कैग ने कहा कि महादलितों के लिए सामुदायिक भवन 916 में से मात्र 147 पूरे हुए। बाकी 608 भवन का काम शुरू ही नहीं हुआ। यह आंकड़ा 2016-19 के बीच का है। गया-मानपुर पथ प्रमंडल में आदेश के उल्लंघन के चलते 2.73 करोड़ रुपये ज्यादा खर्च हुआ। अभियंता प्रमुख ने सड़क बनाने के लिए स्टोन चिप्स मानपुर से लाने को कहा था। लाया गया कोडरमा से। 38 किमी के बदले 100 किमी दूर से मंगाया गया। 
 
मनरेगा में कम रोजगार का सृजन

महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में मनरेगा के तहत रोजगार का कम सृजन हुआ। निबंधित दिव्यांग व्यक्तियों में से केवल 14 फीसद को ही रोजगार मिल सका। देश में सबसे ज्यादा 88.61 लाख भूमिहीन मजदूर निबंधित हैैं। इसमें 60.88 लाख (69 फीसद) का सर्वेक्षण किया गया। इसमें सिर्फ 3.34 फीसद इ'छुक भूमिहीन परिवारों को जाब कार्ड दिया गया। इसके बाद सर्वेक्षण बंद कर दिया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर वर्ग को रोजगार के अवसर देने के लिए योजनाएं नहीं बनाई गईं। ग्रामीण विकास का भी यही हाल है। स्थायी संपत्ति निर्माण की योजनाएं सिर्फ 14 फीसद ही पूरी हो सकीं। 65 फीसद काम पांच साल तक अधूरा पड़ा रहा। 

 
लोहिया पथ चक्र में खजाने पर 18.42 करोड़ का बोझ

रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार राज्य पुल निर्माण निगम ने भी कई स्तर पर गड़बड़ी की, जिससे राजस्व क्षति हुई। प्रविधानों का उल्लंघन करते हुए निविदा मांगी गई। तकनीकी स्वीकृति से पहले ही ठीकेदार को 66.25 करोड़ का भुगतान भी कर दिया गया। इससे राजकोष पर 18.42 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ा। 

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