Lockdown AGAIN! महाराष्‍ट्र से लौट रहे मजदूरों को डरा रहा पिछले साल का मंजर, लॉकडाउन की आहट के बीच लौट रहे बिहार

महाराष्‍ट्र से आने वाले यात्रियों की पटना जंक्‍शन पर हो रही कोरोना जांच। जागरण

Lockdown AGAIN! पिछले साल के मंजर ने घर लौटने को किया मजबूर पुणे से लौटे प्रवासियोंं ने कहा हर इलाके में बढ़े मामले बंद हो गई फैक्ट्री नहीं मिल रहा काम बोले- बिहार वापसी के लिए नहीं मिल रहा था टिकट स्पेशल ट्रेन की सूचना मिली तो हुई राहत

Shubh Narayan PathakMon, 12 Apr 2021 06:38 AM (IST)

पटना, आशीष शुक्ल। Lockdown AGAIN! पिछली दफा दूसरों से मांगकर खाना पड़ा। बाहर निकलते तो मार खाते थे। तीन महीने फंसे रहे। जैसे-तैसे ट्रक में खड़े होकर गांव पहुंचे थे। वह डर मन में समाया है। फिर वहां वैसी ही स्थिति है। फर्क सिर्फ इतना है कि अभी लॉकडाउन का एलान नहीं हुआ है। लेकिन, सब कुछ बंद ही है। जेब में रुपये भी खत्म हो रहे थे। इसी कारण सोचा कि हालात खराब हों, इससे गांव तो पहुंच जाएं। यह आपबीती पुणे स्पेशल ट्रेन से दानापुर पहुंचे मधुबनी निवासी विजय कुमार की है। चेहरे पर कोरोना की दूसरी लहर की चिंता की लकीरें साफ दिख रही हैं।

कड़ी पाबंदियों के बीच बंदी की राह पर पुणे

रात करीब 12 बजे कोविड टेस्ट कराने के बाद दानापुर स्टेशन के बाहर ऑटो के इंतजार में साथियों के साथ बैठे मो. राजू भी पुणे स्पेशल ट्रेन से आए थे। तीन बैग और अन्य सामान साथ था। पास में उनका बेटा हुसैन व पत्नी बैठी थी। बोले-पिछले साल मई में पुणे से मुश्किल से घर लौटे थे। तब भी कोरोना के मामले ऐसे ही बढ़े थे पुणे में। सबकुछ बंद हो गया था। खाने के लाले थे और रुपये घर से मंगाने पड़े थे।

चार दिनों तक लगाते रहे स्‍टेशन का चक्‍कर

राजू का कहना है कि बच्चे व पत्नी के साथ घर लौटने के लिए चार दिनों तक थाने से लेकर स्टेशन का चक्कर लगाते रहे। कई किमी पैदल चलना पड़ा था। बड़ी मुश्किल से दानापुर पहुंचे थे। आज फिर उसी स्टेशन पर स्पेशल ट्रेन से उतरे। चिंता रोजगार की जरूर थी, लेकिन सुकून यह कि अब सुरक्षित घर पहुंच जाएंगे। राजू दरभंगा के रहने वाले हैं और चार महीने पहले ही पुणे गए थे। वे वहां बैग बनाते थे।  

साथियों के साथ गांव का रास्ता पकड़ने को हुए मजबूर

मो. कादिर अपने तीन अन्य दोस्तों के साथ प्लेटफॉर्म नंबर-एक पर मेडिकल बूथ के बाहर कतार में खड़े थे। सभी दरभंगा के हैं। बताया कि एक दिन में 500 से 600 रुपये मिलते थे। रोज कमाना और रोज सामान खरीदकर खाना। पुणे में कोरोना के बढ़ते आंकड़े से हाहाकार मचा है। कड़ी पाबंदियां लगाकर निपटने के जतन तो वहां किए जा रहे हैं, लेकिन दैनिक श्रमिक से लेकर दूसरे राज्यों से काम करने पहुंचे लोगों के सामने मुसीबत आ गई है।

काम नहीं मिलने से कमरे का किराया देना भी मुश्किल

पुणे से लौटने वाले लोगों का कहना है कि फैक्ट्री बंद हो गई है और कहीं काम नहीं मिल रहा था। बिना पैसे के कमरे का किराया चुकाना और खाने का बंदोबस्त करना मुश्किल हो जाता। गांव में भी जमीन नहीं है। कहते हैं, अब तभी लौटेंगे, जब सब कुछ सामान्य हो जाएगा। अपने जिले में कम पैसे में भी काम करेंगे।

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