Bihar Politics: बिहार में दोनों गठबंधनों को डर, कहीं आजाद न हो जाए बोतल वाला जिन्न

बिहार में दोनों गठबंधनों का इस बात कर डर है कि कहीं बोतल में बंद 'जिन्न' आजाद न हो जाएं।

बिहार में मामूली अंतर से एक खेमे में बहार है तो दूसरे खेमे में सत्ता से बेदखल रहने की अकुलाहट है। हालांकि डर का औसत दोनों तरफ बराबर है कि बोतल में बंद जिन्न आजाद न हो जाएं।

Publish Date:Sun, 29 Nov 2020 06:59 PM (IST) Author: Akshay Pandey

अरविंद शर्मा, पटना। बिहार में अबकी सत्ता की सियासत बहुत नाजुक है। मामूली अंतर से एक खेमे में बहार है तो दूसरे खेमे में सत्ता से बेदखल रहने की अकुलाहट है। हालांकि डर का औसत दोनों तरफ बराबर है कि बोतल में बंद 'जिन्न' आजाद न हो जाएं। विधायकों की वफादारी कायम रहे, इसलिए ताले पर ताले लगाए रखने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने सत्ता पक्ष के कई विधायकों को रांची जेल से ही फोन करके आने वाली चुनौतियों की ओर संकेत भी कर दिया है।

चंचल मिजाज और सियासी चरित्र से हर कोई वाकिफ

चार दलों के गठबंधन वाले सत्ता पक्ष का डर स्वाभाविक है, क्योंकि हिंतुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) प्रमुख जीतनराम मांझी और विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) के अध्यक्ष मुकेश सहनी के चंचल मिजाज और सियासी चरित्र से हर कोई वाकिफ है। सत्ता पक्ष को असल खतरा लालू प्रसाद के प्रयासों में ही दिखता है, जिनके सेवादार के मोबाइल में बिहार के सारे विधायकों का नंबर सेव है। सिर्फ भाजपा के विधायक ललन पासवान ही नहीं, कई अन्य ने भी स्वीकार किया है कि उनके पास भी रांची से फोन आता रहा है। यहां तक कि हालात भांपकर भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को भी लालू ने प्रलोभन देने में कोई संकोच नहीं किया। उनसे भी पाला बदल लेने का आग्रह किया। जाहिर है, करीब तीन वर्षों से ज्यादा समय से सियासी कैनवास से ओझल होकर जेल में रहते हुए भी लालू प्रसाद ने अपनी अहमियत कम नहीं होने दी है। भले ही उनकी कोशिशों को कामयाबी नहीं मिल पाई है, परंतु इस कवायद ने सत्ता पक्ष के माथे पर बल तो ला ही दिया है। 

किसी भी हाल में सत्ता की चाल को अपने पक्ष में है करना

किसी भी हाल में सत्ता की चाल को अपने पक्ष में करने की जुगत में जुटे महागठबंधन के सामने भी ऐसा ही खतरा दिख रहा है। इसीलिए तेजस्वी यादव अपने सभी मोर्चे को गर्म रखना चाहते हैैं। तेजस्वी के सामने दोतरफा चुनौती है। पहले तो उन्हें महागठबंधन की गांठ को मजबूत रखना है। फिर राजद के विधायकों को भी भटकने से बचाना है। तेजस्वी यादव की पूरी कवायद में इस चिंता की झलक दिखती है। परिणाम आते ही जब उन्हें लगा कि मामूली अंतर से सत्ता से वह दूर रह गए हैैं तो उन्होंने महागठबंधन के घटक दलों के प्रमुख नेताओं को समीक्षा के लिए बुला लिया। उन्हें एकजुटता की शपथ दिलाई और सब्जबाग भी दिखाया कि एक रहेंगे तो उनके भी अच्छे दिन आ सकते हैैं। 

संख्या बल के चलते राजद में टूट का खतरा कम

राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार कहते हैं कि संख्या बल के चलते राजद में टूट का खतरा कम है, मगर कांग्रेस में ज्यादा है। 75 विधायकों वाले राजद में टूट के लिए दो तिहाई विधायकों का जुगाड़ आसान नहीं होगा, लेकिन 19 विधायकों वाली कांग्रेस को बचाए रखने की गारंटी नहीं ली जा सकती है। खासकर सत्ता से बाहर रहने पर।

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