बिहार में कोरोना के टीके के साथ राजनीतिक टीके की चर्चा भी खूब, वक्त बताएगा कौन है ज्यादा असरदार

आगे समय बताएगा कि किसके टीके कितने कामयाब रहे।

मांझी का टीका किस मर्ज की दवा है पता नहीं चलता। एनडीए में साथ रहते हुए भी उन्होंने बड़े भाई भाजपा का नाम लिए बिना नीतीश की यह कहकर तारीफ कर दी कि नीतीश ही ऐसे हैं जो भितरघात के बावजूद गठबंधन धर्म निभाना जानते हैं।

Publish Date:Sat, 16 Jan 2021 10:21 AM (IST) Author: Sanjay Pokhriyal

पटना, आलोक मिश्र। आज सुबह साढ़े दस बजे से कोरोना की उल्टी गिनती शुरू। अभी तक बीमारी भारी थी, टीके के रूप में अब उसकी काट आ गई है। बिहार में भी पहले चरण के लिए 5.69 लाख टीके आ गए हैं। लेकिन यहां केवल कोरोना के टीके नहीं लग रहे, राजनीतिक टीके भी चर्चा में हैं। असर के लिए दोनों टीकों की ही मियाद है। कोरोना के मामले में पहले टीके के 28 दिनों के बाद दूसरा लगेगा और लगभग 45 दिनों के बाद एंटीबॉडी बनने लगेगी। वहीं राजनीति के टीकों के असर के लिए खरमास खत्म होने का इंतजार किया जा रहा था। ये टीके भारतीय जनता पार्टी के पास हैं, राजद के पास भी। जदयू और कांग्रेस के पास भी अपने-अपने लिए हैं। दावे के दिन आ गए हैं और अब देखना है कि किसका टीका कितना असरकारी है?

अच्छे दिन लाने के लिए दिल्ली में आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना के टीके की शुरूआत करेंगे तो उसके 15 मिनट बाद पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। उसके बाद बिहार में सभी जगह टीके लगने शुरू हो जाएंगे। प्रतिदिन 300 केंद्रों पर 30 हजार टीके लगाने का लक्ष्य है। लोग उत्साहित हैं और सरकार पूरी तरह तैयार। केंद्रों तक टीका पहुंचाने, लगाने और उसके परिणाम तक का रिहर्सल किया जा चुका है। अब उसे हकीकत में उतारने की तैयारी है। हालांकि कोरोना से बिहार कभी नहीं घबराया और न घबराई यहां की राजनीति। पिछले साल मई-जून में जब कोरोना चरम पर था, तब कुछ सुस्त जरूर पड़ी थी राजनीति, लेकिन कुछ समय बाद फिर फड़फड़ाने लगी। कोरोना अपना काम करता रहा और यहां चुनाव तक हो गए। चुनाव में एक-दूसरे का पानी उतारने के लिए तरह-तरह के वाक्य प्रयोग हुए। चुनाव हो गया और सरकार बन गई, लेकिन पॉलिटिक्स का वायरस ठंडा नहीं पड़ा। कोरोना को मारने के लिए टीके का इंतजार होने लगा तो दल भी अपने-अपने टीके लेकर मैदान में उतर गए हैं।

राजनीतिक टीकों को लेकर एक असमंजस है कि कौन किसे लगा रहा है, यह पता नहीं चलता। गत शनिवार और रविवार को पटना में जदयू (जनता दल यूनाइटेड) की राज्य परिषद की बैठक हुई। बैठक में कम सीट पाने की कसक उभरी, हारे हुए प्रत्याशियों के गुबार निकले और आरोप लगे कि हार के पीछे लोजपा से ज्यादा भाजपा जिम्मेदार है। कहने वालों ने और भी तरह-तरह के आरोप लगाए, जबकि जिम्मेदारों ने मौन साधे रखा। जदयू के इस टीके को राजद के लिए बेहतर और भाजपा के लिए नुकसानदायक समझा गया, लेकिन भाजपा तो भाजपा, बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव ने काट वाला टीका निकाला और राजद को यह कहकर लगाया कि खरमास बाद वह खुद को बचाकर दिखाए। टीका राजद को लगाया, लेकिन असर जदयू पर हुआ।

जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामचंद्र प्रसाद सिंह की मौजूदगी में सांसद राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने यह कहकर भूपेंद्र के दावे पर मुहर लगाई कि अगर वे चाहेंगे तो राजद टूट जाएगा। राजद भी पीछे नहीं है उसने भी पार्टी तोड़ने वाला टीका दिखाते हुए एलान कर रखा है कि खरमास बाद जदयू के 17 विधायक टूट जाएंगे। खरमास आ गया है और दोनों टीकों की विश्वसनीयता दांव पर लगी है। एनडीए के सहयोगी हम (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा) के जीतनराम मांझी राजद को चिढ़ाने भी लगे हैं कि असर कराकर दिखाओ। 

उलझाव भरे इस टीके को समझने में लोग जुटे हुए हैं। उधर कांग्रेस का टीका उसी के लिए दुखदायी बना है। चुनाव में हार की कसक से वह अभी तक हलकान है। पुराने प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल के हटने के बाद नए प्रभारी भक्तचरण दास रोग का कारण जानने पहुंचे तो बैठक में ही कुर्सयिां चल पड़ीं। हार का कारण जानने के लिए प्रत्याशियों की बैठक बुलाई तो आधे से ज्यादा नदारद नजर आए। अब टिकट से वंचित आरोप लगा रहे हैं कि टिकट लिया, पैसा लिया और हारने के बाद नदारद हो गए। इनके बूते तो ठीक हो चुकी कांग्रेस। बहरहाल, अब भक्तचरण दास एंटीडोट ढूंढ रहे हैं। आगे समय बताएगा कि किसके टीके कितने कामयाब रहे।

[स्थानीय संपादक, बिहार]

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