बिहार पंचायत चुनाव 2021: घर से बाहर आने लगे सास-बहू के झगड़े, एक दूसरे को बेहतर बताने की जोर आजमाइश

Bihar Panchayat Chunav 2021 बिहार पंचायत चुनाव को लेकर प्रशासन के स्तर चल रही गतिविधियां तेज हो गईं हैं। जहां सास-बहू एक दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में हैं वहां परिवार की तल्खी अब धीरे-धीरे चुनावी मैदान में दिखने लगी है।

Rahul KumarThu, 16 Sep 2021 05:12 PM (IST)
बिहार पंचायत चुनाव में सास-बहू के बीच खुद को बेहतर बताने की जोर आजमाइश चल रही है। सांकेतिक तस्वीर

सिमरी(बक्सर),संवाद सहयोगी। Bihar Panchayat Chunav त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर जहां प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो गई है, वहीं संभावित उम्मीदवारों में जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की होड़ मची हुई है। सबके अपने अपने  एजेंडे हैं और उसी के बूते वे जनसमर्थन के प्रयास में लगे हुए हैं। मगर सबसे दिलचस्प स्थिति उन पंचायतों की है, जहां सास-बहू एक दूसरे के खिलाफ चुनावी रण क्षेत्र में जोर आजमाइश करने को बेताब हैं। परिवार की तल्खी जो घरों के अंदर तक सीमित थी अब धीरे-धीरे चौखट की दहलीज को पार करने लगी है।

चुनावी रण में सास-बहू आमने-सामने

कल तक जो बहू सास के सामने ऊंची आवाज में बात करने का साहस नहीं जुटा पाती थी, वहीं आज चुनावी दंगल में जोर आजमाइश की खुली चुनौती दे रही हैं। इस दौरान नाते रिश्ते की गरिमा की दीवार पार कर जनता के बीच दोनों विकासात्मक एजेंडे की बजाए एक दूसरे की कमियां गिनाने में लगी हैं। सिमरी प्रखंड क्षेत्र में यह नजारा दो-तीन पंचायतों में दिख रहा है। प्रचार के दौरान मर्यादा का भी ख्याल नहीं, मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए घर की बात भी सामने लाई जा रही है। बताते चलें कि आगामी 26 अक्टूबर से सिमरी प्रखंड में नामांकन का दौर शुरू होगा तथा 8 दिसंबर को मतदान प्रस्तावित है। 

गांव बदलते ही बदल जाता है प्रत्याशियों का चोला  

जागरण संवाददाता, डुमरांव (बक्सर) । त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारी चरणवार हो रही है। फिलहाल इसको लेकर इलाके में नेताओं की न सिर्फ एक नई प्रजाति आई है, वल्कि इस बार के पंचायत चुनाव में प्रत्याशियों का ट्रेंड भी बदला है। वोट के लिए इलाके में इन दिनों जनसंपर्क अभियान जोरों पर है। ऐसे में गांव बदलते हैं प्रत्याशियों के चोले भी बदल जाते हैं। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रत्याशी इस पंचायत चुनाव को भी दलीय रूप में ढ़ालकर अपना गोटी लाल करने की फिराक में।

जैसा देश वैसा भेष की तर्ज पर विशेषकर जिला परिषद के प्रत्याशी कहीं हरा तो कहीं भगवा गमछा लहराकर खुद को अमुक दल के समर्थित उम्मीदवार साबित करने में बाज नहीं आते हैं। यही नहीं वोट मांगने की क्रम में कोई गरीबों का मसीहा तो कोई स्थानीय और गांव के लोगों से संबंध होने का दावा करते हैं और क्षेत्र की समस्याओं को गिनाते हैं। हालांकि पीठ पीछे गांवों के लोग इन्हें पैराशूट नेता कहते हैं। ऐसे नेता सिर्फ पंचायत चुनाव के दौरान अवतरित होते हैं। हद तो तब हो जाती है, जब प्रत्याशी सोशल मीडिया पर इस बात को वायरल करते हैं कि फलां के राज में अधिकारियों को धमकाकर जबरन काम करवाते थे। यही नहीं मौजूदा प्रतिनिधियों से पांच साल का हिसाब-किताब मांगने लगते हैं। हिसाब भी ऐसे मांग रहे हैं, जैसे उन्होंने पिछले पांच सालों से इलाके की जन समस्याओं के लिए आम जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया हो। 

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