Bihar Election 2020: बिहार चुनाव के दूसरे चरण में रोजगार बनाम जंगलराज की गूंज

तेजस्वी को सुनते और मोबाइल में कैद करते युवा। जागरण
Publish Date:Sat, 31 Oct 2020 10:40 AM (IST) Author: Sanjay Pokhriyal

पटना, आलोक मिश्र। शब्द दिखाई नहीं देते, लेकिन होते हैं सबसे ज्यादा असरदार। चुनावी रण में इसी के सहारे जंग जीती जाती है और इसी के गलत उपयोग से हारी भी जाती है। शब्दों की टकराहट से ही नए-नए शब्द उपजते हैं। बिहार में दूसरे चरण में अब नया शब्द आ गया है जंगलराज का युवराज। एनडीए पहले चरण की कठिन लड़ाई के बाद दूसरे को आसान बनाने के लिए अब इस हथियार के साथ मैदान में है।

बिहार की राजनीति जातिवादी समीकरण : जवाब में राजद के तेजस्वी के पास रोजगार का नारा है। जो वो पहले चरण से ही थामे हैं। यानी दूसरे चरण की लड़ाई अब रोजगार बनाम जंगलराज का युवराज पर टिक गई है। बिहार की राजनीति जातिवादी समीकरणों पर ही टिकी होती है। पिछले 30 वर्षों से इसी आधार पर आकलन किया जाता रहा है। विकास, भ्रष्टाचार, जैसे तमाम शब्द उपजते हैं और जनता को प्रभावित भी करते हैं, लेकिन ऐन चुनाव के समय जातिवाद इन पर छा जाता है। इस चुनाव में पहले चरण की 71 सीटों पर मतदान होने के बाद इसी आधार पर जीत-हार का आकलन जारी है और दूसरे चरण के लिए गोलबंदी भी। लेकिन महागठबंधन और एनडीए दोनों ही अपने परंपरागत वोटों को जिताऊ अंक तक पहुंचाने के लिए तरह-तरह के शब्दों का सहारा ले रहे हैं।

तेजस्वी पर जंगलराज का युवराज का बाण : केंद्र व राज्य सरकार के कामों के सहारे चुनाव में आगे बढ़ी एनडीए को तेजस्वी के रोजगार के नारे के आगे अपनी रणनीति बदलनी पड़ी, क्योंकि बेरोजगार युवाओं को यह नारा भाता नजर आया। इसे कुंद करने के लिए तरह-तरह के प्रयोग हुए। पैसा कहां से आएगा, घूस ली जाएगी, कश्मीरी आतंकवाद आ जाएगा वगैरह, वगैरह लेकिन इन्हें बेअसर देख जब एक तरफ पहले चरण के वोट पड़ रहे थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री नीतीश की मौजूदगी में तेजस्वी पर जंगलराज का युवराज का बाण चलाया। अब एनडीए इसी के सहारे दूसरे चरण को फतह करने के मूड में है।

एक तरफ शोर मचाता युवा तो दूसरी तरफ शांत, गंभीर भीड़ : दूसरी तरफ तेजस्वी अपने परंपरागत वोटों (यादव व मुस्लिम के माई समीकरण) को थामे लड़ाई को युवा बनाम बुजुर्ग का रूप देने में जुटे हैं। खुद युवा और नीतीश को बुजुर्ग ठहरा उन्हें रिटायर करने की अपील करते वह हर जगह नजर आ रहे हैं। दोनों का अंदाज जुदा है और उनकी भीड़ का मिजाज भी। एक तरफ शोर मचाता युवा तो दूसरी तरफ शांत, गंभीर भीड़। नीतीश सीधे युवाओं से संवाद न करके कहते हैं कि युवाओं को समझाइए तो दूसरी तरफ युवा कहीं-कहीं हूट भी कर देता है।

नई पीढ़ी का बता जात-पात से उबरने की बात : वह रोजगार मांगता है तो नीतीश अपने अंदाज में उसे समझाने की कोशिश करते हैं। जबकि तेजस्वी इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इस लड़ाई में हालांकि एनडीए की फौज के आगे तेजस्वी एक तरह से अकेले हैं, लेकिन दस से पंद्रह रैली कर वह जवाब देने में जुटे हैं। वह खुद को नई पीढ़ी का बता जात-पात से उबरने की बात हर जगह कह रहे हैं। उनकी इस बात पर युवा उत्साहित भी होता है, लेकिन जाति के पक्षधर इसे युवाओं की जाति के खिलाफ लामबंदी न मान उनकी गणना जातियों के हिसाब से ही कर रहे हैं और उसी आधार पर परिणाम का आकलन भी।

अब मंगलवार को दूसरे चरण की 94 सीटों पर चुनाव होना है। इसमें फिलहाल एनडीए की ही प्रतिष्ठा दांव पर है, क्योंकि जदयू की 30 व भाजपा की 20 मिलाकर 50 सीटें एनडीए के पास है, जबकि महागठबंधन के पास 41 है, जिसमें 33 राजद, सात कांग्रेस व एक सीट माले की है। इसके अलावा दो लोजपा व एक निर्दलीय के पास है। एनडीए, जंगलराज के युवराज के सहारे इस चरण में भारी पड़ना चाहता है, जबकि तेजस्वी रोजगार के सहारे इसमें सेंध लगाना चाहते हैं।

लेकिन इस लड़ाई में लोजपा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि भाजपा की पक्षधर बनकर जदयू के खिलाफ तगड़े प्रत्याशी उतार वह लड़ाई को रोचक बनाए हुए है। लोजपा के नीतीश विरोधी और मोदी भक्ति के शुरूआत से ही बह रहे सुरों से पैदा हुए भ्रम को भाजपा ने दूर करने की कोशिश तो की, लेकिन पहले चरण में वह ज्यादा दूर नहीं हो सका। अब भाजपा और जदयू दोनों ही सामंजस्य बना इस चरण में इसे पूरी तरह दूर करने में जुटे हैं। अब सभी की निगाहें तीन नवंबर पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि पलड़ा किस तरफ झुकने वाला है?

[स्थानीय संपादक, बिहार]

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