Bihar Assembly Election 2020: महागठबंधन के नौकरियों के पिटारे पर भाजपा ने चला टीके का दांव

पटना में भाजपा के घोषणा पत्र को जारी करतीं केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण। जागरण
Publish Date:Sat, 24 Oct 2020 10:22 AM (IST) Author: Sanjay Pokhriyal

पटना, आलोक मिश्र। बिहार में चुनाव अब दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। जनता के मर्म को छूने की कोशिश में सभी जुटे हैं। एक-दूसरे के वादों को झूठा ठहराने और खुद की कसमों को सही साबित करने की कवायद जोरों पर हैं। राजद की पोटली से निकला दस लाख नौकरियों का वादा इस समय भारी पड़ता दिख रहा है। इसकी काट में भाजपा मुफ्त में कोरोना वैक्सीन का टीका लेकर आई है। चुनाव जनता को करना है कि उसके लिए क्या जरूरी है?

बिहार के चुनाव में जातियों का बोलबाला रहता है, इस बात को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन अन्य मुद्दे भी प्रभावी होते ही हैं। सभी दलों ने जातिगत समीकरणों को देखकर ही अपने प्रत्याशी उतारे और उसी अनुसार प्रचार की रणनीति बनाई। नीतीश कुमार के पास बताने के लिए अपने व केंद्र के कामों की फेहरिस्त भी थी। जिस पर एनडीए यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अपना रोडमैप तैयार किया। चुनाव शुरू होने से पहले विपक्ष के पास केवल सत्तापक्ष की काट के अलावा कुछ और नहीं था। पलड़ा एनडीए की तरफ ही झुका दिखाई दे रहा था। लेकिन तेजस्वी ने बढ़ती बेरोजगारी की नब्ज टटोलने के लिए एक पोर्टल बनाया, जिसमें बाइस लाख से ज्यादा युवाओं ने पंजीकरण करा लिया। तेजस्वी ने इस मुद्दे को भांप पहली कैबिनेट में ही दस लाख नौकरी देने का वादा कर इसके ताप को और बढ़ा दिया। जदयू और भाजपा दोनों इसे कुंद करने में जुटे रहे। वादे को झूठा ठहराने के लिए बजट का अर्थशास्त्र तक पढ़ा डाला गया। लेकिन तेजस्वी अभी तक पटरी से नहीं उतरे हैं। अब भाजपा ने भी 19 लाख रोजगार देने का वादा कर दिया है और जदयू के भी निश्चय दो में यह मौजूद है।

हालांकि भाजपा जानती है कि रोजगार पर राजद का पलड़ा भारी है, इसलिए गुरुवार को जारी अपने संकल्प पत्र में वादा कर डाला कि सरकार आएगी तो बिहार में कोरोना का टीका मुफ्त में दिया जाएगा। उसके इतना कहते ही विपक्ष हमलावर हो गया। राहुल ने कह दिया कि लोगों को राज्यों का चुनाव कार्यक्रम देखना चाहिए, ताकि पता चल सके कि उसे कोरोना वैक्सीन मुफ्त कब मिलेगी। विपक्ष के तेवर देख फिलहाल लगने लगा है कि इसे अब एनडीए ज्यादा तूल देने वाला नहीं, क्योंकि शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में अपनी पहली चुनावी रैली में इस पर कोई जोर नहीं दिया। उनका फोकस एनडीए सरकार की उपलब्धियों और लालू शासन की नाकामियों पर ही रहा। जबकि उन्हीं के साथ अपने चुनावी अभियान का आगाज करने वाले राहुल गांधी ने रोजगार को धार दी। हमेशा की तरह राहुल की झोली से चीन, जीएसटी, कोरोना काल में प्रवासियों की बदहाली, नोटबंदी, अंबानी-अडानी और किसान भी निकले।

लोजपा के चिराग भी अब मैदान में कूद आए हैं। मोदी की तस्वीर लगाने पर भाजपा के विरोध के बाद वह मान तो गए हैं, लेकिन अपने को मोदी का हनुमान लगातार बता रहे हैं। नीतीश पर हमला और भाजपा के साथ सरकार बनाने के उनके बोल से यह संशय बना ही हुआ है कि वह किस पाले में हैं? प्रधानमंत्री की सभा पर लोगों की निगाहें थी कि वे शायद कुछ स्थिति स्पष्ट करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने केवल इतना कहा कि कुछ युवा शक्ति भ्रम फैला रही है। अब इशारा किस पर था, यह समझ, समझने वाले को विकसित करनी है। ऐसी ही बातों और दावों के बीच चुनाव गति पकड़े हुए है।

कोरोना को नकारने के बाद भी कोरोना चर्चा में है। चर्चा मानकों के टूटने को लेकर है, चर्चा नेताओं के लपेटे में आने को लेकर है। चुनावी सभाओं में उमड़ती भीड़ के कारण अब तक 25 प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है और 15 की अनुशंसा हो चुकी है। तमाम नेता भी चपेट में आ रहे हैं, जिसमें भाजपा का ही पलड़ा भारी है। अब तक भाजपा के स्टार प्रचारक शाहनवाज हुसैन, राजीव प्रसाद रूड़ी, उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी और जदयू सांसद विजय मांझी चपेट में आ चुके हैं। पहले चरण के मतदान की तिथि भी नजदीक आ चुकी है। आगामी बुधवार को पहले चरण के वोट पड़ेंगे, उसके लिए हवा बनाने में इसी तरह की कवायद जारी है।

[स्थानीय संपादक, बिहार]

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