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बौद्ध सर्किट की एकजुटता से ही निकलेगा विश्व शांति का रास्ता

राजगीर। अंतररा9ष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में 5वां दो दिवसीय धर्म-धम्म सम्मेलन शुरू हो गया। इसके उद्घाटन सत्र में जूना अखाड़ा के महामण्डलेश्वर आचार्य अवधेशानंद गिरि ने कहा कि समकालीन विश्व के लिए यह सम्मेलन बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को लेकर समझने का मौका दिया है। कहा कि हिदू और बौद्ध विद्वानों को एक होकर सामूहिक तौर से इस विषय को सार्थक बनाने की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है। जिसमें हिदू परंपरा, चित्त और आनंद जैसी तीन आवश्यक विशेषताओं के संबंध में निरपेक्षता की परिकल्पना समाहित है। उन्होंने भारतीय ज्ञान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह आवश्यक गुणों को समझने और प्रकट करने के लिए है। जब कोई इन तीन तथ्यों को जानता या अनुभव करता है तो वहीं स्थिति जीवन से मुक्ति है। जिसे शास्त्रों में निर्वाण कहा गया है।

उन्होंने सम्मेलन की विशेषता पर ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा कि ज्ञान की धरती विश्व गुरु रह े नालंदा के लिए एक उपलब्धि है। जिसके गौरवशाली अतीत के दौरान हिदू और बौद्ध परंपराओं का प्रत्यक्ष गवाह रहा है। यह सम्मेलन में वर्तमान परिवेश में अत्यंत प्रासंगिक है। जो नि:संदेह सभी प्राणियों को अपनी आत्मा या परमात्मा की अलौकिकता का अनुभव करता है। जिसमें घृणा नहीं है जो समाज को एक सूत्र में जोड़ने का प्रयास करता है। 

वहीं श्री लंका सरकार के वायम्बा विकास सह बुद्धस्साना मंत्री जेमिनी जयाविक्रमा परेरा ने कहा कि हिदू और बौद्ध विद्वानों के साझेदारी द्वारा इस सम्मेलन के माध्यम से एक नई इबारत दुनिया को प्रस्तुत करने की जरूरत है।

भूटान के संस्कृति मंत्री लियोंपो शेल्फ ग्याल्त्सेन ने  नालंदा एवं भूटान के मध्य सांस्कृतिक संबंधों पर प्रकाश डाला। कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध एवं ज्ञान परंपरा पर आधारित पाठ्यक्रम विकसित होगा। 

इस क्रम में सत्तर की अध्यक्षता करते हुए नालंदा विश्वविद्यालय की कुलपति सुनैना सिंह ने अकादमिक विचार विमर्श को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य नालंदा विश्वविद्यालय को एक अग्रणी विचारक एवं ज्ञान के मूलभूत केन्द्र के रूप में केवल दक्षिणी पूर्वी एशियाई क्षेत्र में हीं नहीं। बल्कि वैश्विक पटल पर स्थापित करना है। वहीं सम्मेलन की वास्तविकता, ज्ञान और विभिन्न ²ष्टिकोणों से मूल्यों, प्रकृति, मानव एवं ब्रह्मांड के अस्तित्व के महत्त्व को समझने के लिए विभिन्न पहलुओं में चिन्तन ²ष्टि विकसित करना है। जहां शत,चित्त आनंद की मूलभूत भावना नालंदा में प्राचीन काल से रही है। यह सम्मेलन भारत और विदेश के प्रमुख राजनेताओं, नीति निर्माताओं, धार्मिक प्रमुखों आदि के साथ-साथ समकालीन दुनिया नये ज्ञान विज्ञान को पता लगाने के लिए एक साथ आने वाले श्रेष्ठ चितकों को एकीकृत मंच प्रदान करता है।

सम्मेलन का शुभारंभ वैदिक और बौद्ध के संयुक्त परंपरागत मंगलपाठ से हुआ। वहीं इंडिया फाउंडेशन के ललिता कुमार मंगलम ने सभी विशिष्ट अतिथियों तथा प्रतिनिधियों का स्वागत किया। जिसमें 11 देशों के 250 प्रतिष्ठित विद्वान शामिल हुए। इसके अलावा श्री लंका, भूटान, कोरिया, और चाइना के प्रतिनिधि मंडल भी शिरकत कर रहे थे। 

इससे पहले नोट सत्र की अध्यक्षता नई दिल्ली के भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद के पूर्व अध्यक्ष प्रो एस आर भट्ट ने की। इस सत्र के प्रमुख वक्ता राम माधव, गणेशन, हरिप्रसाद स्वामी व प्रो थिच न्याहटू ने अपनी अपनी राय प्रकट किए। जिन्होंने शत वास्तविकता अस्तित्व विषय पर अपने व्याख्यान की प्रस्तुति दी। इस अवसर पर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडी के प्रो मकरंद परांजपे, आईसीपीआर के अध्यक्ष प्रो लि मान्ह थट, लैम न्गोदूप दोर्जी, प्रो वर्तिका हर्डोडिल तथा विठ्ठल नादकर्णी ने भी अपनी अपनी राय प्रकट किए। जिन्होंने हिदू और बौद्ध परंपराओं में सत्त के विभिन्न आयामों पर जोर दिया। 

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