पश्चिम चंपारण: नई पीढ़ी के लिए थारू समाज ने खुद बनवाया संग्रहालय

बदल रहे परिवेश में थारू समाज के युवा अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं। इससे परंपराओं के सिमटने का खतरा उत्पन्न हो गया है। इसे बचाने के लिए थारुओं नेखुद के खर्च पर बगहा दो प्रखंड के महादेवा में दो कमरे का संग्रहालय विकसित किया है।

Ajit KumarWed, 28 Jul 2021 03:44 PM (IST)
बगहा के महादेवा में दो कमरे में रखी गईं हैं आम जीवन में उपयोग होने वाली वस्तुएं। फोटो- जागरण

अर्जुन जायसवाल, हरनाटांड़ (पश्चिम चंपारण)। सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण संरक्षण के लिए पहचाना जाने वाला थारू समाज इसे संजोने में जुटा है। दरअसल, बदल रहे परिवेश में थारू समाज के युवा अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं। इससे परंपराओं के सिमटने का खतरा उत्पन्न हो गया है। इसे बचाने के लिए थारुओं ने खुद के खर्च पर बगहा दो प्रखंड के महादेवा में दो कमरे का संग्रहालय विकसित किया है। इसमें पुरानी पारंपरिक वस्तुएं रखी गई हैं। आधुनिकता के इस दौर में बहुत सी पुरानी वस्तुएं प्रचलन से बाहर होती जा रही हैं। संस्कृति को दर्शाने वाली इन वस्तुओं से नई पीढ़ी पूरी तरह से अनजान है। इसे देखते हुए थारू कल्याण महासंघ ने वर्ष 2012 में ऐसी वस्तुओं को एकत्रित करने का निर्णय लिया। इसके लिए महासंघ ने थारुओं के विभिन्न परिवारों से ऐसी पुरानी वस्तुओं को जुटाना शुरू किया। कुछ ऐसी वस्तुओं को खरीदने के लिए धन की जरूरत हुई तो चंदा कर 50 हजार रुपये जुटाए गए। धीरे-धीरे 250 से अधिक एंटीक वस्तुएं इक_ा हो गईं। इसे एक जगह रखने की समस्या आई तो भारतीय थारू कल्याण महासंघ के कार्यालय में एक छोटी सी जगह उपलब्ध करा दी गई।

इसके बाद संग्रहालय को मूर्त रूप देने की कवायद होने लगी। जानकारी होने पर दो महीने पहले वाल्मीकिनगर विधायक धीरेंद्र प्रताप उर्फ ङ्क्षरकू ङ्क्षसह ने महादेवा में दो कमरों का एक भवन उपलब्ध करा दिया। इसमें सभी वस्तुओं को सुरक्षित रखा गया है। देखरेख के लिए 60 लोगों की समिति बनाई गई है। इसके अध्यक्ष हरिहर काजी और सचिव शुभम नीरज बताते हैं कि यहां रखीं अधिकांश वस्तुएं आमजीवन में उपयोग में लाई जाती रही हैं। थारुओं के घरों में ये कई पीढिय़ों से रखी थीं। उन्हें यहां एकत्र किया गया है। ये सभी हस्तशिल्प का बेजोड़ नमूना भी हैं।

ये हैं कुछ प्रमुख वस्तुएं : समिति सदस्य टेकमनी देवी, खूबलाल प्रसाद, तारकेश्वर काजी, लालावती देवी आदि बताते हैं कि पुराने जमाने में थारू शिकार के लिए गुरता (धनुष जैसा हथियार) उपयोग करते थे। काठ गाड़ी भी चलन में थी। संग्रहालय में इन्हें देखा जा सकता है। इसके अलावा खुटकी (बांस व तार के सहयोग से बना चिडिय़ा फंसाने वाला यंत्र), जतरी (बांस व पत्थर से बना चूहा या चिडिय़ा पकड़े का उपकरण), कोइन (बांस से बना मछली पकडऩे का औजार), गोड़हारा (पैर में पहना जाने वाला महिलाओं के लिए बना चांदी का आभूषण), मोना (सीक व मूंज से बना गहना व कपड़े रखने की वस्तु), बेउगी (खाद्य या कोई सामग्री रखने की वस्तु) और ढेंकली (धान कूटने का उपकरण) सहित अन्य वस्तुएं रखी गई हैं। संग्रहालय सुबह 10 से शाम पांच बजे तक खुलता है। कोई भी निशुल्क देख सकता है। 

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