मुजफ्फरपुर के एईएस पीड़ित बच्चों को दी जाएगी विटामीन कॉकटेल की खुराक, जान‍िए पूरी तैयारी

गर्मी में बच्चों के रहन-सहन को देखने के लिए गांव में पहुंची टीम।

एसकेएमसीएच से कल्चर मशीन की वापसी पर टीम नराज रिसर्च सेंटर का लिया जायजा। इलाज प्रोटोकॉल में एईएस कॉकटेल को किया गया शामिल टीम ने देखी इलाज की व्यवस्था। अब इलाज की जांच के लिए एसकेएमसीएच में सारे उपकरण मौजूद।

Ajit KumarSun, 11 Apr 2021 02:50 PM (IST)

मुजफ्फरपुर, [ अमरेन्द्र तिवारी]। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के सलाहकार व एम्स जोधपुर के शिशुरोग विभागाध्यक्ष डॉ. अरुण कुमार सिंह एईएस प्रभावित गांव में जाकर वहां बच्चों के रहन-सहन का अध्ययन किया। अध्ययन करने के बाद एसकेएमसीएच के चिकित्सकों की टीम से बातचीत करने के बाद रविवार को वापस हो गए। उनके सुझाव पर इस बार एईएस इलाज प्रोटोकॉल में विटामीन कॉकटेल को शामिल किया गया है। एसकेएमसीएच उपाधीक्षक व शिशु रोग विभागाध्यक्ष डा.गोपाल शंकर सहनी ने बताया कि इस साल 2021 के लिए जो इलाज प्रोटोकॉल यानी एसओपी जारी हुआ है। उसमें विटामीन कॉकटेल की खुराक इलाजरत बच्चों को मिलेगी। यह मल्टीविटमीन की खुराक होगी जो इंजेक्शन, सीरप व टेबलेट के रूप में उपलब्ध होगा।

जमालबाद पहुंची टीम, देखा रहन-सहन

शोध को आए डा.अरूण कुमार सिंह मुशहरी प्रखंड के जमालाबाद पहुंचे। यहां 2019 में एक बच्चे की मौत एईएस से हुई थी। केयर इंडिया के जिला समन्वयक सौरभ तिवारी ने शोध टीम का सहयोग किया। डा.सिंह ने बताय कि वह उस गांव में बच्चे किस तरह के मकान में रहते है। उनके खान-पान की क्या व्यवस्था है, घर के अंदर कितना तापमान रहता है। उस गांव में किस तरह का रहन-सहन है इसको देखे है। वह जब बच्चे बीमार होकर आने लगेंगे तो उस समय एक बार आयेंगे। बीमारी के प्रकोप से पहले व उसके बाद की हालाता पर वह पूरी नजर रखेंगे। डा. सिंह ने कहा कि अब तक कोई ठोस कारण सामने नही है। लेकिन जोा बच्चे ेबीमार हुए उसमें ज्यादा कुपोषित रहे है। उसके बाद बीमारी के कारण उनका माइटोकांड्रिया डैमेज हो रहा है।

एईएस का प्रकोप 1995 से मुजफ्फरपुर व आसपास के जिलों में है. इससे गर्मी में हर साल बच्चों की जान जाती है. एईएस पीडि़त बच्चों के माइटोकांड्रिया पर शोध किया जा रहा है.

बीमारी के यह होते लक्षण

एईएस से पीड़ित बच्चों में बुखार के अचानक शुरू होता है और शरीर में ऐंठन होती है. उसके बाद मूंह से झाग निकलनेे लगाता है. अगर समय पर इलाज हुआ तो ठीक वरना बच्चे की मौत हो जाती है.

मासूम बच्चों में आ रही माइटोकॉन्ड्रिया की समस्या

बीमार बच्चों में ग्लूकोज की कमी और गर्मी के बीच विशेषज्ञों को आशंका है कि बच्चों में कुछ आनुवंशिकी कारणों से भी यह बीमारी हो रही है। माइटोकॉन्ड्रिया की समस्या दो एक साल तक के बच्चों में अमूमन नहीं मिलती है, मगर एईएस के केस में लगभग सौ ऐसे बच्चे आये हैं जो इस समस्या के शिकार थे। 2819 में पहली बार इलाज के दौरान बच्चों के सभी ऑर्गेन की पैथोलॉजि जांच भी की गयी है। इसी में माइटोकॉन्ड्रिया जैसी कॉमन समस्या सामने आयी।

जांच में यह बात सामने आई कि माइटोकोंड्रिया का फेल होना और अमोनिया का डिटॉक्सीफाई(विष विहीन) न होना सामने आया।

इस बार रिसर्च में इस बात पर बल

- सभी बच्चों की पैथोलॉजिक जांच

- हर डैमेज ऑर्गेन की जांच और बायोप्सी

-तापमान व जलवायु के अनुसार डीएनए व आरएनए में बदलाव

-बच्चे व माता-पिता के डीएनए की जांच की कवायद

- गांव में रहन-सहन व इस बीमारी के जद में आने वाले बच्चों के पारिवारिक पृष्टभूमि

पहले इस तरह से चल रहा था काम

- इलाज के दौरान कई आवश्यक जांच पर ध्यान नहीं

-इलाज के क्रम में माइक्रोऑर्गेन की जांच नहीं हुई

-रिसर्च के लिए गांव के बागानों में मच्छर को पकड़ा गया

-पीड़ित स्वस्थ हो चुके बच्चों की जांच किए बगैर रिसर्च हुआ

-सैंपल भेजने के दौरान सैंपल को सुरक्षित रखने पर ध्यान नहीं

एसकेएमसीएच के पीआईसीयू एंड रिसर्च सेंटर में शुरू

, राष्ट्रीय मानसिक आरोग्य एवं स्नायु विज्ञान संस्थान (निमहांस) की ओर से भी शोध चल रहा है। एईएस पीड़ित बच्चों की लैब जांच एसकेएमसीएच के पीआईसीयू एंड रिसर्च सेंटर में होगी भर्ती होने वाले बच्चों व पूर्व में लिए गए ब्लड सैंपल, यूरिन व रीढ़ के पानी की जांच एसकेएमसीएच के माइक्रोबायोलजी की वायरोलजी लैब में होगी.

दिल्ली में बनी शोध की रणनीति बीमारी को लेकर 19 जुलाई 2019 को दिल्ली आइसीएमआर मुख्यालय में रिसर्च एवं आगामी लाइन ऑफ एक्शन पर कार्यशाला हुई। जिसमें आइसीएमआर के निदेशक डॉ.एमवी मुरेकर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोलॉजी यानी निमहांस के डॉ. वी रवि, सेंट्रल टीम लीडर एम्स दिल्ली के डॉ.अरुण कुमार सिंह, सीएमसी वेलौर के डॉ. टी जैकब जॉन, एनसीडीसी दिल्ली के डॉ.आकाश श्रीवास्तव, एसकेएमसीएच के शिशु विभागाध्यक्ष डॉ.गोपाल शंकर साहनी, एम्स पटना के डॉ.लोकेश कुमार तिवारी शामिल हुए। सभी ने इस बीमारी पर अपने शोध पत्र को प्रस्तुत किया। कार्यशाला में शामिल देश के करीब 60 चिकित्सकों ने अपनी राय दी। उसके बाद से अब नए तरीके से शोध हो रहा है। 

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