सीएम नीतीश की पार्टी के सर्वोच्च पद पर उपेंद्र कुशवाहा की ताजपोशी की सुगबुगाहट, चढ़ा मुजफ्फरपुर का राजनीतिक पारा

जदयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा अभी मुजफ्फरपुर के दौरे पर नहीं आए हैं लेकिन पूर्व जिलाध्यक्ष रंजीत सहनी का गुट सक्रिय हो गया है। इसने हाल में एक चिंतन शिविर का आयोजन किया जिसमें चर्चा हुई कि आरसीपी के आने के बाद पार्टी जनता से दूर हो गई।

Ajit KumarWed, 28 Jul 2021 06:40 AM (IST)
जदयू के अभियान व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काम को पंचायत स्तर पर पहुंचाने की बनी रणनीति। फाइल फोटो

मुजपफरपुर, [अमरेन्द्र तिवारी]।बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में अपेक्षा के अनुसार परिणाम नहीं आने के बाद पार्टी के तत्कालीन मुखिया सह सीएम नीतीश कुमार ने बदलाव की जो प्रक्रिया शुरू की थी वह अब तक जारी है। एक तरह से कहा जाए तो इसका दूसरा चरण चल रहा है। पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह को केंद्र की राजनीति में भेजना और रालोसपा के विलय के बाद संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष बनाए गए उपेंद्र कुशवाहा की ताजपोशी की सुगबुगाहट को आपस में जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीति के जानकार सीएम नीतीश कुमार की तर्ज पर उपेंद्र कुशवाहा के बिहार परिभ्रमण को भी इसी संदर्भ में देख रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा ने अभी तक मुजफ्फरपुर का दौरा भले ही नहीं किया हो, लेकिन जिले का राजनीतिक पारा विशेषकर जदयू का, बहुत चढ़ गया है। अलग-अलग खेमों में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। रालोसपा से जदयू में आए नेताओं का मनोबल ऊंचा दिख रहा है। इस बीच पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष रंजीत सहनी के नेतृत्व में एक चिंतन शिविर का आयोजन हुआ। इसमें ऐसे लोग उपस्थित हुए जो कालक्रम में जदयू की मुख्यधारा से अलग थे। इसने चर्चाओं को और बल दे दिया है। इंटरनेट मीडिया पर लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं।

चिंतन शिविर में वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह की कार्यशैली पर सीधे तौर पर सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने खुलकर कहा कि 2010 में सरकारी सेवा से आए आसीपी सिंह के हाथ में कमान जाने के बाद संगठन की लोगों से दूरी बढ़ गई है। पिछले दिनों उपेन्द्र कुशवाहा से मिलकर आए रंजीत सहनी ने कहा कि चिंतन शिविर में उठाए गए मुद्​दों को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व संसदीय बोर्ड अध्यक्ष के सामने रखा जाएगा।

मुख्यमंत्री के काम का नहीं मिल रहा वोट के रूप में दाम

कांटी प्रखंड जदयू के पूर्व अध्यक्ष सौरभ साहेब ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार बेहतर काम कर रहे हैं। बावजूद संगठन को उस काम का दाम वोट के रूप में नहीं मिल पा रहा है। कहा गया कि 2001 में समता पार्टी काल के बाद मीनापुर की सीट जीते थे। 2005 में 11 सीटों पर सफलता मिली, 2010 के बाद का हाल यह है कि केवल दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे। जीत रहे केवल एक। उन्होंने कहा कि जबतक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथ में सरकार के साथ संगठन की कमान रही, केवल जिला, युवा, महिला, महानगर व अल्पसंख्यक यूनिट ही काम करती थी और परिणाम बेहतर आता था। आज 30 से ज्यादा प्रकोष्ठ हैं, लेकिन परिणाम शून्य है। शिविर में शामिल अन्य वक्ताओं ने कहा कि 2005 मेंं पिलखी पुल, रघई घाट पुल व कई फ्लाईओवर बनाए गए। 2010 के बाद हालत यह रहा कि चंदबारा घाट पुल का निर्माण ठप है। समता काल से साथ रहे अधिवक्ता परशुराम मिश्रा ने बताया कि जबसे कार्यकर्ता के बदले अधिकारी से फीडबैक लेने का सिलसिला चला है। कार्यकर्ता उपेक्षित होने लगे हैं। विकास की गति कम हो गई है और पार्टी में विखराव होने लगा है।

प्रकोष्ठ में ऐसे लोग जिनके पास न अनुशासन न पकड़

समता पार्टी के काल से साथ रहे जेपी सेनानी अधिवक्ता परशुराम मिश्रा कहते हैं कि ऐसे-ऐसे लोग प्रकोष्ठ में अाए जिनको पार्टी से कोई मतलब नहीं है। वे केवल बोर्ड लगाकर घूमने का शौक रखते हैं। जमीन पर काम जो होना चाहिए वह नहीं दिख रहा, यह दुखद है। अब कार्यकर्ता सीधे सीएम नीतीश कुमार तक अपनी बात पहुंचा पाएंगे।

 

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