जाति जनगणना अभियान रथ पहुंचा शिवहर, लोगों ने किया स्वागत

जाति जनगणना रथ के माध्यम से हर चौक -चौराहों पर प्रचार-प्रसार किया गया है। फोटो : जागरण

15 जनवरी से प्रथम चरण का अभियान शुरू हुआ है। इसके तहत 30 जनवरी तक पश्चिमी चंपारण पूर्वी चंपारण शिवहर सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर जिले में अभियान चलाकर लोगों से जाति आधारित जनगणना के लिए समर्थन लिया जाएगा ।

Publish Date:Thu, 21 Jan 2021 09:38 AM (IST) Author: Ajit kumar

शिवहर, जासं। जाति के आधार पर जनगणना कराने की मांग को लेकर जाति जनगणना अभियान रथ सूबे के विभिन्न जिलों का भ्रमण करते हुए शिवहर पहुंचा। जाति जनगणना अभियान के राष्ट्रीय संयोजक राज नारायण के नेतृत्व में प्रथम चरण के अभियान के तहत शिवहर पहुंचे रथ का भव्य स्वागत किया गया। 

अभियान के राष्ट्रीय संयोजक राज नारायण ने बताया कि, 15 जनवरी से प्रथम चरण का अभियान शुरू हुआ है। इसके तहत 30 जनवरी तक पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर ,सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर जिले में अभियान चलाकर लोगों से जाति आधारित जनगणना के लिए समर्थन लिया जाएगा। बताया कि 15 जनवरी को बापू की सत्याग्रह स्थली भितिहरवा से अभियान की शुरूआत की गई है। अभियान के पांचवे दिन शिवहर में पोस्टर प्रदर्शन कर लोगों को जागरूक किया गया है। जबकि, जाति जनगणना रथ के माध्यम से हर चौक -चौराहों पर प्रचार-प्रसार किया गया हैं। बताया कि 22 जनवरी को सफर का पड़ाव मुजफ्फरपुर जिला होगा।

राष्ट्रीय संयोजक ने लोगों से इस अभियान से जुड़ने की अपील की है। वहीं पीएम से भी जाति आधारित जनगणना के महत्व को समढने की अपील की है।

बताया कि भारत में तमाम जातियों की आखिरी गिनती 1931 की जनगणना में की गई थी। 1941 में दूसरे विश्व युद्ध के कारण जनता का काम पूरा नहीं हो सका और आजादी के बाद सरकार ने यह सोचकर जाति आधारित गणना बंद कर दिया गया कि, इससे जातिवाद खत्म हो जाएगा। इसका नतीजा यह हुआ कि अब देश की सारी नीतियां 1931 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर बनती है। कहा कि, दस साल पहले उन्होंने जाति आधारित जनगणना के लिए राष्ट्रव्यापी मुहिम चलाई थी। वर्ष 2009 से 2011 के बीच चली मुहिम को बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन मिला था। कहा कि, जाति के आधार पर राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं। प्रत्याशी का चयन करते है। जातियों के आधार पर नीतियां बनती है और आरक्षण दिया जाता है। फंड का बंटवारा भी जाति के आधार पर होता है। अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग आयोग है। नहीं है तो जातियों का आंकड़ा। इन आंकड़ों के अभाव में पूरा देश एक अंधकार भरी सुरंग में यात्रा कर रहा है । इस स्थिति से बचने के लिए जातियों की गणना जरूरी है। 

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