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AMAZING: बेटियों के प्यार में बसा डाला दामादपुरवा, यहां घर-जमाई बनने का दिया जाता है ऑफर

पश्चिम चंपारण, विनोद राव बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में बगहा प्रखंड अंतर्गत नरईपुर के लोगों को बेटियां इस कदर प्यारी हैं कि वे शादी के बाद अपनी नजरों से दूर नहीं होने देते। बेटी और दामाद को यहीं बसा लेते हैं। 50 से अधिक परिवारों के दामाद यहां बसे हैं। इसके चलते लोग इसे दामादपुरवा के नाम से पुकारते हैं। यह परंपरा लगभग 70 साल से चली आ रही है। संपत्ति को लेकर कोई विवाद भी सामने नहीं आता। सभी प्यार से रहते हैं। 

1500 से अधिक हैं दमाद

बगहा नगर परिषद के नरईपुर मोहल्ले की जनसंख्या तकरीबन पांच हजार है। यहां 1500 से अधिक दामाद हैं। अधिकतर कृषि कार्य से जुड़े हैं। 70 वर्षीय बाबूराम यादव का जन्म यहीं हुआ था। उनके पिता यहां के दामाद थे। वह बताते हैं कि उस समय कुछ ही परिवारों के दामाद यहां रहते थे। धीरे-धीरे दामाद को यहीं रखने की परंपरा सी बन गई। बेटा होने के बाद भी अधिकतर परिवारों ने बेटियों को यहीं बसा लिया है। मेहनत-मजदूरी कर जीवन-यापन करने वाले लोग बंटवारे और हिस्सेदारी से ऊपर उठकर प्रेमभाव से रहते हैं।

बेटे के साथ रहते दामाद भी

यहां के मुखलाल चौधरी की बेटी दुलारी की शादी बांसगांव औसानी निवासी उमेश से आठ साल पहले हुई थे। मुखलाल के दो बेटे हैं। इसके बाद भी उन्होंने दामाद को बेटी के साथ यहीं रखा है। लालू यादव की पुत्री संध्या पति के साथ यहीं रहती हैं। जगरनाथ के तीन बेटे हैं। इनकी पुत्री प्रभावती पति व बच्चों के साथ 10 साल से यहीं रहती हैं। चन्नर चौधरी के दो बेटे हैं। बावजूद अपनी बेटी व दामाद को यहीं रखे हैं। वे कहते हैं कि बेटा-बेटी उनके लिए एक समान हैं। श्रीकिशुन चौधरी ने अपने दामाद सुभाष को यहीं बसा लिया। सुभाष ने बेटी की शादी की तो दामाद भोली को यहीं बसा लिया। सटेली यादव, रामअवध साह व जगरनाथ गोंड कहते हैं कि कुछ लोगों ने दामाद को बकायदा जमीन में हिस्सा भी दिया है। वहीं, कुछ ने यहां बसने के लिए रुपये-पैसे से पूरी मदद की है।

कागज पर नाम है नरईपुर

नगर परिषद के उप सभापति जितेंद्र राव कहते हैं कि कागज में इसका नाम नरईपुर ही है, लेकिन बोलचाल में लोग इसे दामादपुरवा कहते हैं। जब भी यहां की बेटी का ब्याह तय होता है तो दामाद को घर जमाई बनने का ऑफर दिया जाता। अधिकतर इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं। दामाद भी बेटे की तरह हो जाते हैं।

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