पश्चिम चंपारण में कस्तूरबा गांधी की परंपरा सहेजे हैं थरुहट की बेटियां

भितिहरवा आश्रम परिसर में बुनियादी स्कूल की स्थापना की गई। फोटो :

गौनाहा प्रखंड के स्कूलों में आज भी पेड़ के पत्तों से मुकुट बैज व बुके बनाकर अतिथियों का स्वागत करती हैं छात्राएं।कस्तूरबा गांधी ने 1917 में भितिहरवा प्रवास के दौरान शुरू की थी यह परंपरा प्रकृति से यह प्रेम आज भी जीवित।

Ajit kumarMon, 22 Feb 2021 07:40 AM (IST)

पश्चिम चंपारण, [सुनील आनंद]। बापू की कर्मस्थली भितिहरवा में कस्तूरबा गांधी ने प्रकृति से सानिध्य और पर्यावरण संरक्षण की जो परंपरा शुरू की थी, वह आज भी जीवित है। गौनाहा प्रखंड के थरुहट के स्कूलों की छात्राएं इसका पालन करने के साथ इसके प्रति लोगों को जागरूक कर रही हैं। नवंबर, 1917 में कस्तूरबा गांधी भितिहरवा आई थीं। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को लेकर काम किए। अशिक्षा दूर करने के लिए भितिहरवा आश्रम परिसर में बुनियादी स्कूल की स्थापना की गई। आश्रम में आनेवाले अतिथियों को आम के पल्लव (कोमल पत्ते) का बना मुकुट, बैज, सागौन के पत्ते का बुके देकर स्वागत करने की परंपरा उन्होंने शुरू की थी। 103 साल बाद भी यह परंपरा भितिहरवा आश्रम के अलावा कस्तूरबा बालिका उच्च विद्यालय भितिहरवा, राजकीय मध्य विद्यालय भितिहरवा, प्राथमिक विद्यालय श्रीरामपुर और प्राथमिक विद्यालय बैरटवा में जीवित है। 

कस्तूरबा बालिका उच्च विद्यालय भितिहरवा में 10वीं की छात्रा काजल कुमारी कहती है कि किसी साहित्यिक या सांस्कृतिक आयोजन में वह अपने हाथ से पत्ते का मुकुट, बैज और बुके बनाती है। इसी से अतिथियों का स्वागत किया जाता है। कोई प्रशिक्षण नहीं लिया। सीनियर छात्राओं को बनाते देख सीख लिया। प्राथमिक विद्यालय श्रीरामपुर की छात्रा सुमन कहती है कि मेरी दादी आम के पल्लव से मुकुट बनाती हैं। उन्हीं से सीखा। बुनियादी विद्यालय भितिहरवा के शिक्षक रामनरेश घोष का कहना है कि पर्यावरण के साथ थरुहट के लोगों का गहरा जुड़ाव है। कस्तूरबा जिस तरह अतिथियों का स्वागत करती थीं, वह परंपरा अभी जीवंत है। सेवानिवृत्त शिक्षक शिवशंकर चौहान कहते हैं कि यहां की बेटियां लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक भी करती हैं।

गांधी स्मारक संग्रहालय में यादगार वस्तुएं आज भी संरक्षित

दीपेंद्र बाजपेयी, भितिहरवा, (प. चंपारण): गांधी स्मारक संग्रहालय भितिहरवा में ऐसी कई चीजें संग्रहित हैं, जिसका इस्तेमाल कस्तूरबा गांधी ने यहां किया था। इसमें वह चक्की भी शामिल है, जिससे गेहूं पीसती थीं। स्कूल की मेज, स्कूल की घंटी और कुआं जैसी उनसे जुड़ी यादगार निशानियां आज भी हैं। यहां कस्तूरबा की प्रतिमा भी लगाई गई है। संग्रहालय के प्रभारी शिवकुमार मिश्र कहते हैं कि महात्मा गांधी की सोच थी कि जब तक यहां के लोग पढ़े-लिखे और स्वस्थ नहीं होंगे, उन्हें असली आजादी नहीं मिलेगी। इसलिए उन्होंने यहां तीन स्कूल खोले। उनमें भितिहरवा सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि इसकी बागडोर खुद कस्तूरबा गांधी और प्रिय सहयोगी डॉ. देव के हाथों में थी। कस्तूरबा यहां छह महीने तक रहीं। उन्होंने आसपास के इलाके में शिक्षा, स्वच्छता और बेहतर स्वास्थ्य के लिए अभियान चलाया।

 

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