मुजफ्फरपुर में खूब कहा जा रहा, रोकने वाले ही जहर बिकवाए तो मौत से कौन बचाए?

मामले को दो दिनों तक गोल-गोल घुमाया गया। फोटो : जागरण

कटरा में भी पिछले दिनों कुछ ऐसा ही हुआ। गरीबों की बस्ती दरगाह पर शराब माफिया की नजर गई। कहते हैं साहब को नजराना देकर मौखिक लाइसेंस ले लिया लेकिन किस्मत ने दगा दे दिया। पहले ही दिन बनाई गई मिलावटी शराब ने जहर का रूप ले लिया।

Ajit kumarMon, 22 Feb 2021 09:27 AM (IST)

मुजफ्फरपुर, [प्रेम शंकर मिश्रा]। कहते हैं कि कहीं एक भी पत्ता खड़कता है तो कोतवाल को उसकी जानकारी हो जाती है। मगर शराब से जुड़े मामले में यह कुछ उलटा हो रहा है। कटरा में भी पिछले दिनों कुछ ऐसा ही हुआ। गरीबों की बस्ती दरगाह पर शराब माफिया की नजर गई। कहते हैं 'साहब' को नजराना देकर मौखिक लाइसेंस ले लिया, लेकिन किस्मत ने दगा दे दिया। पहले ही दिन बनाई गई मिलावटी शराब ने जहर का रूप ले लिया। सेवन करने वाले एक-एक कर दम तोडऩे लगे। मामले का राज ना खुले इसके लिए महकमे ने जोर लगाया। इसका छींटा ना पड़े इसलिए मामले को दो दिनों तक गोल-गोल घुमाया गया। मगर इसने इतना तूल पकड़ लिया कि दबी जुबान ही सही, सच स्वीकारना पड़ा। कोतवाल पर कार्रवाई हुई। अब यह सवाल उठने लगा, रोकने वाला ही जहर बिकवाए तो मौत से कौन बचाए?

सबकुछ गंवाकर होश में आए तो क्या किया

उत्तर बिहार की राजनीति में इस समाज का दबदबा रहा है। जिले की राजनीति की दिशा भी यह समाज तय करता है। मगर पिछले विधानसभा चुनाव में जिले से इस समाज को एक भी प्रतिनिधित्व नहीं मिला। कुछ माह तक हार-जीत का विश्लेषण करने पर अहसास हुआ कि समाज में बिखराव इसका मुख्य कारण रहा। बस फिर क्या था। समाज को एकजुट करने की मुहिम शुरू हुई। विपरीत ध्रुव समझे जाने वाले दो नेता साथ आए। समाज के पुरोधाओं को साधते हुए आगे की रणनीति तय कर ली गई। समाज से जुड़े राज्यभर के हजारों लोगों को एक मंच पर साथ लाया जा रहा है। ताकि यहां से पटना तक संदेश पहुंचे। विधानसभा चुनाव के बाद इस मुहिम को लेकर एक और चर्चा चल रही। कहा जा रहा, पहले ऐसा होता तो चुनाव परिणाम पर फर्क पड़ता। प्रतिनिधित्व तो मिलता। मगर सबकुछ गंवाकर होश में आए...।

बाबू की ठाठ से पदाधिकारियों को भी जलन

जिले के एक बाबू बस कहने भर के लिए इस पद पर हैं। हनक से लेकर ओहदा तक काफी ऊपर है। ठाठ ऐसी कि कई पदाधिकारियों को भी नसीब नहीं। सरकारी के साथ गैर सरकारी काम के लिए स्पेशल गाड़ी। यहां तक कि पदाधिकारी को भी कोई काम निकालना हो तो उन्हें भी उनकी ही शरण लेनी होती है। खास यह कि कई 'तबादले' के बाद भी उनकी जगह नहीं बदली। वर्षों से एक ही जगह जमे रहने से सवाल भी उठने लगे हैं। शिकायतें भी आने लगी हैं। पद का दुरुपयोग कर एक सरकारी कार्यालय को 'निजी भवन' में शिफ्ट कराने की शिकायत भी शामिल है। कभी-कभी पदाधिकारियों को वे पत्र भी जारी कर देते हैं। इससे नाराजगी तो होती, मगर पदाधिकारियों को इसे पीना पड़ता है। बिल्ली के गले में आखिर घंटी कौन बांधे।

'बहती गंगा' में खूब हाथ धोए, अब गले की हड्डी

पंचायतों की महत्वपूर्ण योजना नल का जल में वार्ड सदस्य से लेकर कई मुखिया ने खूब माल बटोरा। गुणवत्ता तो दूर पैसा लेकर काम भी नहीं हुआ। पंचायत प्रतिनिधियों ने सोचा अधिक से अधिक जांच होगी। वर्षों तक यह चलती रहेगी। इसी पैसे से चुनाव लड़कर फिर पद हासिल कर लेंगे। मगर पंचायती राज विभाग के नए निर्देश ने उनके मंसूबे में बड़ी बाधा डाल दी है। यह योजना अब उन मुखिया के लिए गले की हड्डी बन गई है जिन्होंने काम नहीं कराए। जिला स्तर तक तो बहाना या नजराना से काम चल जा रहा था। अब मामला फंसता नजर आ रहा है। क्योंकि विभाग ने दो टूक कह दिया है जहां योजना का काम नहीं हुआ वहां के मुखिया अगला चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। वहीं चुनाव की घोषणा के गिनती के दिन ही बचे हैं। अब काम होना मुश्किल लग रहा। 

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