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Samastipur : आय और आयु दोनों बढ़ाने में सहायक है औषधीय पौधों की खेती, तुलसी की खेती ज्यादा फायदेमंद

तुलसी की खेती होगा क‍िसानों को लाभ। प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर

Bihar News तुलसी की खेती कर की जा सकती है अच्छी आमदनी हर प्रकार के मौसम और मिट्टी में की जा सकती है खेती भारतीय स्वास्थ्य और आजीविका प्रणाली का एक अभिन्न अंग रहा है जिसका उल्लेख ऋग्वेद और अथर्वेद में भी किया गया है।

Dharmendra Kumar SinghSun, 09 May 2021 03:46 PM (IST)

समस्‍तीपुर, [पूर्णेन्दु कुमार] । औषधीय पौधों की खेती किसानों की आय के साथ-साथ स्वस्थ रखने की दिशा में भी काफी कारगर है। औषधीय पौधों की खेती और उपयोग देश में प्राचीन काल से होते आ रहा है। भारतीय स्वास्थ्य और आजीविका प्रणाली का एक अभिन्न अंग रहा है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद और अथर्वेद में भी किया गया है। इसे वैज्ञानिक तरीके से कर हम अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। भारत में विभिन्न औषधीय पौधों में तुलसी का एक महत्वपूर्ण है। कोरोना काल में डॉक्टर भी काढ़ा पीने के लिए कहते हैं। उसमें सात-आठ तुलसी का पत्ता जरूर डालने की बात करते हैं। तुलसी के पत्ते का सेवन करने मात्र से कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। इसलिए यह काफी महत्वपूर्ण है।

दैवीय एवं पवित्र पौधा माना जाता है तुलसी

तुलसी को प्राचीन काल से ही एक दैवीय और पवित्र पौधा माना गया है। जिसे हर घर में पूजा होती है। तुलसी के पौधे का धार्मिक एवं औषधीय महत्व है। कहा गया है कि जहां तुलसी मां का वास होता है, वहां सुख, शांति एवं आर्थिक समृद्धि अपने आप आ जाती है। भारत में तुलसी की खेती सदियों से की जा रही है एवं आयुर्वेद में इसका बहुत बड़ा स्थान है। तुलसी के पत्ते बीज और सूखे जड़ों का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है।

तुलसी का महत्व औषधीय महत्त्व

तुलसी के सभी भाग- पत्ते, बीज, तना का किसी न किसी रूप में उपयोग करके बहुत सारे रोगों का उपचार किया जाता है। इसका प्रतिदिन सेवन करने से कई प्रकार के रोगों से राहत मिलती है। तुलसी का अर्क सैकड़ों रोगों में लाभदायक है। इसका उपयोग सर्दी, जुकाम, खांसी, बुखार, फ्लू, डेंगू, मलेरिया, जोरों का दर्द, मोटापा, ब्लड प्रेशर, शुगर, एलर्जी, पेट में कृमि, हेपेटाइटिस, जलन, मूत्र संबंधी रोग, गठिया, दम फूलने, आंख दर्द, खुजली, सिर दर्द, पैर या फेफड़ों में सूजन, अल्सर, वीर्य की कमी, हार्ट ब्लॉकेज आदि समस्याओं से एक साथ निजात दिलाने में होता है। तुलसी की पत्तियों में एक चमकीला पीला वास्तुशिल्प तेल पाया जाता है, जो कीड़े और बैक्टीरिया के खिलाफ उपयोग होता है। बिहार में तुलसी की खेती समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, नवादा और बक्सर जिलों में ज्यादा किसान करते हैं। वे अच्छी आमदनी भी प्राप्त कर रहे हैं।

तुलसी की हैं कई प्रजातियां

विश्व में तुलसी की 150 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती है। लेकिन इनकी मूल प्रकृति एवं गुण लगभग एक समान है। तुलसी की ओसिमस सेक्टम प्रजाति के तेल एवं सुखी पत्तियों की बाजार में काफी मांग है। इसकी तेल काफी कीमती होती है। इसके अलावा श्री तुलसी,श्यामा तुलसी, जंगली तुलसी, राम तुलसी या वन तुलसी, मीठी तुलसी आदि है।

हर प्रकार के मौसम में की जा सकती है खेती

तुलसी की खेती सभी प्रकार के मौसम में की जा सकती है। यह सभी भूमि में की जा सकती है। बलुई, दोमट जिसमें पानी की निकासी का उचित प्रबंध हो इसके लिए बहुत उपयुक्त है। बेहतर उपज के लिए 5 से 8 पीएच मान वाली मिट्टी काफी अच्छी होती है। इसकी बुवाई का समय मई से जून है तथा खेत में बिचड़े की रोपाई का उचित समय जून-जुलाई है। वैसे सर्दी के मौसम को छोड़कर वर्ष में कभी भी इसे लगाया जा सकता है।

खाद एवं उर्वरक

गोबर की सड़ी हुई खाद 20 से 30 टन प्रति हेक्टेयर एवं नेत्रजन 80 किलोग्राम, फास्फोरस 40 किलोग्राम तथा पोटाश 40 किलोग्राम देना चाहिए। अंतिम जुताई के समय सड़ी हुई गोबर की खाद की पूरी मात्रा नेत्रजन की आधी मात्रा एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में मिलाकर मिट्टी को अच्छी तरह जुताई करके खेत को समतल बनाएं। शेष नेत्रजन की मात्रा को दो बराबर भागों में बांटकर फसल रोपाई के 1 महीना बाद कुछ अंतराल पर उपरिवेशन करें। इसके साथ खरपतवार नियंत्रण हेतु निकाई- गुड़ाई करें। कृषि यंत्रों का प्रयोग खरपतवार निकालने में किया जा सकता है।

पैदावार

ताजी पत्तियों की उपज 125 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा 15 से 20 किलो बीज प्रति हेक्टेयर है। अच्छी उपज प्रबंधन के द्वारा 17 से 20 लीटर तेल प्रति हेक्टेयर प्राप्त किया जा सकता है जिसका बाजार मूल्य 60,000 के आसपास है।

कहते हैं वैज्ञानिक

तुलसी की खेती कर किसान अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। आज देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी तुलसी की मांग है। इसकी पत्तियां, बीज, तना, सूखे जड़ आदि सभी औषधि तैयार करने में आते हैं। इसलिए इसे वृहत पैमाने पर करने की जरूरत है। -डॉ. दिनेश राय, वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा

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