नालंदा से करोड़ों के खराब चावल की मुजफ्फरपुर जिले में हुई आपूर्ति

एसएफसी के जिला प्रबंधक ने खराब गुणवत्ता के खाद्यान्न के वितरण पर डीएम के स्पष्टीकरण का दिया जवाब। 62 लाख क्विंटल से अधिक खराब चावल की हुई थी आपूर्ति साहेबगंज एवं पारू में कई जगहों पर वितरण भी।

Ajit KumarThu, 05 Aug 2021 08:22 AM (IST)
साहेबगंज के वीआइपी विधायक राजू सिंह ने खराब चावल के वितरण की शिकायत की थी। फाइल फोटो

मुजफ्फरपुर, जासं। जिले में खराब गुणवत्ता वाले करोड़ों के चावल की आपूर्ति की गई थी। इसका वितरण पीडीएस के माध्यम से कई जगहों पर कर भी दिया गया। यह स्वीकारोक्ति एसएफसी (राज्य खाद्य निगम) के जिला प्रबंधक रमन चौपाल की है। जिला प्रबंधक ने डीएम प्रणव कुमार को दिए स्पष्टीकरण में कहा कि नालंदा से तीन माह में 62 हजार क्विंटल से अधिक चावल की आपूर्ति हुई थी उसकी गुणवत्ता खराब थी।

जिला प्रबंधक से स्पष्टीकरण मांगा

मालूम हो कि साहेबगंज के वीआइपी विधायक राजू सिंह ने खराब चावल के वितरण की शिकायत की थी। इसकी संयुक्त जांच एडीएम, जिला आपूर्ति पदाधिकारी एवं वरीय उप समाहर्ता ने की थी। जांच में शिकायत सच पाई गई थी। पीडीएस दुकानों से खराब चावल का वितरण किया गया था। अनियमितता की पुष्टि होने पर डीएम ने जिला प्रबंधक से स्पष्टीकरण मांगा था। डीएम को भेजे गए जवाब में जिला प्रबंधक ने कहा कि मई में 25000 क्विंटल एवं जून में 37735 क्विंटल चावल नालंदा से जिले को प्राप्त हुआ था। उसकी गुणवत्ता खराब थी। इसकी सूचना निगम मुख्यालय को भी दी गई थी। इस बीच साहेबगंज एवं पारू के सहायक प्रबंधक ने खराब चावल की आपूर्ति पीडीएस दुकानदारों को कर दी थी। उसका वितरण किया गया। मामला संज्ञान में आने के बाद खराब चावल के वितरण को रोक दिया गया था। उसकी जगह बेहतर गुणवत्ता वाले चावल की मांग की गई।

खराब चावल से सरकार को करोड़ों का चूना

जिला प्रबंधक एसएफसी के स्पष्टीकरण के जवाब को ही सही मानें तो करीब 62 हजार क्विंटल यानी 62 लाख किलो खराब चावल की आपूर्ति की गई। चूंकि यह चावल सीएमआर (धान के बदले मिल से मिला) प्राप्त हुआ था इस कारण इसकी आपूर्ति से सरकार को करोड़ों रुपये का चूना लगा। धान के बदले मिल से करीब 67 प्रतिशत चावल की आपूर्ति हुई। इसका अर्थ यह कि न्यूनतम खरीद मूल्य 1960 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से इतनी राशि में करीब 70 किलो चावल सरकार को मिला। यानी सरकार को एक किलो चावल के लिए 28 रुपये खर्च आया। इस तरह 62 लाख किलो चावल की कीमत 17 करोड़ से अधिक हुई। बेहतर चावल का वितरण बाद में भले ही किया गया हो, मगर आपूर्तिकर्ता ने सरकार को करोड़ों का चूना लगा दिया।

 

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