मुजफ्फरपुर खादी भंडार में अब भी चलता है बापू का चरखा

जिले में दो तरह की मशीन पर सूत की कताई होती है। पहला मशीन है त्रिपुरारी और दूसरा किसान मॉडल। किसान मॉडल पुराना मॉडल है। त्रिपुरारी मॉडल की खासियत यह है कि इसमें सूती ऊनी और रेशमी तीनों ही धागों को काटने की व्यवस्था है।

Ajit KumarFri, 15 Oct 2021 11:44 AM (IST)
उद्योग मंत्री शाहनवाज के सहयोग से चरखा आंदोलन हो रहा मजबूत। फोटो- जागरण

मुजफ्फररपुर, [अमरेन्द्र तिवारी]। मुजफ्फरपुर खादी ग्रामोद्योग संघ व बिहार खादी ग्रामोद्योग संघ मातृ संस्था आज भी गांधीजी के विचारों पर विकसित चरखा ही चल रहा है। सर्वोदय ग्राम कन्हौली खादी भंडार परिसर में सोलर और बिजली से चलने वाले चरखों को स्वीकार नहीं किया गया है। परिसर के साथ यहां से जुडी महिलाएं अपने घर पर भी पारंपरिक चरखा से सूत काटती है। सूत को संग्रह खादी ग्रामोद्योग के बिक्री केन्द्र पर किया जाता है। वहां से फिर जिला मुख्यालय में लाकर बुनाई का काम किया जाता है। जेल में भी बंदी चरखा चलाकर सूत काटते है। जिलाखादी ग्रामोद्योग संघ के मंत्री बीरेन्द्र कुमार का कहना है कि गांधीजी का सोच च्हाथ से कटे और हाथ से बनेज् पर आधारित था। उसमें मशीनों का इस्तेमाल वॢजत था, इसलिए आज भी यहां उसी तकनीक पर चरखों का संचालन होता है। पुरानी तकनीक पर हाथ से चलने वाले चरखों के सहारे ही कपड़े का उत्पादन होता है। यहां से तैयार कपड़े बिहार के साथ दूसरे राज्य में भी भेजे जाते है। त्रिपुरारी मॉडल चरखा से कताई में मदद मिल रही है।

जिले में दो तरह के मशीन पर सूत की कताई होती है। पहला मशीन है त्रिपुरारी मॉडल और दूसरा किसान मॉडल। किसान मॉडल पुराना मॉडल है जिसमें एक तरह से रेशम के धागे की कटाई होती है। त्रिपुरारी मॉडल की खासियत यह है कि इसमें सूती ऊनी और रेशमी तीनों ही धागों को काटने की व्यवस्था है। इस मॉडल को महान गांधीवादी व बिहार खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष रहे त्रिपुरारी बाबू ने विकसित किया था। इससे अब महिलाएं रंग-बिरंगी सूत कात सकती है।अमर शहीद अमर शहीद खुदीराम बोस केन्द्रीय कारा के अधीक्षक वृजेश सिंह मेहता की देखरेख में जेल में बंदी सूत कात रहे है। कारा उपाधीक्षक सुनील मौर्य ने बताया कि जेल में 40 चरखा चल रहा है। उनकी ओर से सूत जो काटा जाता है उससे कपड़ा बनता है। खादी ग्रामोद्योग संघ पूनी उपलब्ध कराता है। बंदी उससे कपड़ा बुनती है।

त्रिपुरारी व किसान मॉडल चरखा से हो रहा उत्पादन

बिहार खादी ग्रामोद्योग संघ मातृ संस्था के अध्यक्ष अभय चौधरी ने बताया फिलहाल 675 चरखे हैं, जिनमें 175 में आठ तकुओं वाला त्रिपुरारी मॉडल के सहारे उत्पादन होता है, जबकि 500 सिंगल तकुआ वाले पारंपारिक किसान चरखा भी चल रहा है। प्रति तकुआ 250 ग्राम कपड़े का उत्पादन होता है। यहां वर्तमान में 500 से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। एक चरखा से एक कतीन प्रतिदिन 100 से 300 रुपए पारिश्रमिक कमा रही है। चौधरी की माने तो सोलर चरखा व बिजली चलित चरखा के प्रचलन की बात सामने आई थी। लेकिन वह यहां पर नहीं लिया गया। अगर संस्था परिसर में बिजली व सोलर का चरखा चलने लगे तो महात्मा गांधी का सपना पूरा नहीं होगा। रोजगार बढ़ाने के साथा ज्यादा से ज्यादा महिला व पुरुष चरखा चलाए इसके लिए आठ तकुआ वाले चरखा की मांग है । और सरकार के सहयोग से संघ उस काम को आगे बढ़ा रहा है। बिहार सरकार के उद्योग मंत्री सैयद शाहनवाज हुसैन का खादी व ग्रामोद्योग के काम को आगे बढ़ाने में काफी सहयोग मिल रहा है। जबसे वह सरकार की ओर से विभाग संभाले है उसके बाद सभी खादी संस्थान में जाकर बैठक करते और उनकी समस्या को सुनकर उसका निदान करा रहे है। इससे आने वाले दिनों में चरखा आंदोलन और मजबूत होगा। 

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