बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करने वाले कार्यक्रमों की है दरकार

बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करने वाले कार्यक्रमों की है दरकार
Publish Date:Mon, 28 Sep 2020 01:18 AM (IST) Author: Jagran

मुजफ्फरपुर : जिले के सरकारी स्कूलों में नामांकन के अनुपात में उपस्थिति की स्थिति बेहतर नहीं है। इस दिशा में सरकारी प्रयास भी हुए। मिड-डे मील व स्मार्ट क्लास इसका हिस्सा रहे। लेकिन, इससे भी स्कूलों में सौ फीसद उपस्थिति दर्ज नहीं हो सकी। आकांक्षी जिला योजना के तहत शिक्षा के स्तर में सुधार लाना भी महत्वपूर्ण कड़ी है। राज्य सरकार के स्तर से हुए प्रयास के साथ इस योजना में भी ऐसी चीजों को शामिल करना जरूरी होगा जो बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित व आकर्षित करें। शिक्षा के तौर-तरीके में बदलाव के साथ इसे मनोरंजक बनाने की जरूरत अभिभावक जता रहे। हालांकि निजी स्कूलों की चुनौती के बीच यह आसान नहीं होगा। कोरोना के बीच सरकारी स्कूल के बच्चों की पड़ताल से कुछ ऐसी बातें ही सामने आ रही हैं। एक ओर निजी स्कूल के बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई हो रही। वहीं सरकारी स्कूल के बच्चे मछली मारने से लेकर मटरगश्ती करते ही नजर आ रहे। वहीं स्कूलों का इस्तेमाल स्थानीय लोग घर के रूप में कर रहे हैं। बाढ़ के बाद ये स्कूल चुनाव के बूथ के रूप में इस्तेमाल होंगे। यानी, इस वर्ष अप्रैल से लेकर नवंबर तक सरकारी स्कूल के बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बंद।

शहर से गांव तक एक जैसी हालत

ग्रामीण के साथ शहरी क्षेत्र के स्कूलों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। शहर के पूर्वी भाग पर स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय कन्हौली। यहां दो कमरे हैं। पेयजल की व्यवस्था नहीं दिखी। एक कमरे में किचन से अटैच बाथरूम। शिक्षा के मंदिर में स्थानीय लोगों ने शरण ले रखी है। यहां कन्हौली विशुनदत्त इलाके के अधिकतर बच्चे नामांकित हैं। लॉकडाउन अवधि का विस्तार होने से स्कूल लगातार बंद चल रहा है। बच्चे बारिश से हुए जलजमाव में मछली पकड़ते नजर आए। विद्यालय में रह रहे व्यक्ति से पूछने पर पता चला कि एक कमरा कागजात, कुर्सी, टेबल से भरा है। दूसरा खाली था तो यहीं रह गए। बरामदा में सिलाई मशीन रखकर कुछ लोगों के कपड़े सिल देते हैं। स्कूल खुलने पर चले जाएंगे। बारिश होने पर छत से पानी टपकता है। उनके घर में पानी घुस गया। इसलिए स्कूल में रहने के लिए एक कमरा खुलवा लिया है। बारिश होने पर कपड़े व बिस्तर गीले हो जाते हैं। स्कूल में बच्चे तो नहीं आते, लेकिन शिक्षक व प्रधानाचार्य हाजिरी बनाने आते हैं। हाजिरी बनाकर तुरंत चले जाते हैं। बीच में दूध और राशन वितरित किया गया था। बच्चे के स्वजन वहां आकर रोज लेते थे। बारिश से सीढ़ी का एक स्टेप भी धंसकर टूट गया। स्कूल के चारों ओर पानी फैला है। दीवारों में सीलन है। रखरखाव के अभाव में वह जीर्ण-शीर्ण हो गया है।

पांचवीं के बाद भटक रहे बच्चे

हरिजन बस्ती के जवाहर राम कहते हैं, मोहल्ले के अधिकतर बच्चे इस विद्यालय में ही पढ़ते हैं। लॉकडाउन से लगातार स्कूल बंद है। टीवी, रेडियो है नहीं। बच्चा कहां पढ़ेगा? सब के सब मटरगश्ती करते इधर-उधर घूमते रहते हैं। स्कूल के शिक्षक भी इसे नहीं देखते। रास्ते से गुजर जाते हैं। वे बच्चों को घूमते देख कुछ नहीं बोलते। पढ़ाई की कोई न कोई व्यवस्था जरूरी थी। निजी स्कूलों को देखिए। वहां मोबाइल पर पढ़ाई हो रही। ऐसे में सरकारी स्कूल के बच्चे पिछड़ेंगे ही। डब्ल्यू कुमार ने बताया पांचवीं तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद बच्चों को सही दिशा नहीं मिल रही। इससे वे भटक जाते हैं। मध्य विद्यालय तक जाते-जाते मजदूरी करने लग जाते हैं। शिक्षक को चाहिए कि प्राथमिक विद्यालय से निकले तो मध्य विद्यालय में बच्चों का नामांकन हो जाए। यह क्रम जारी रहे। ताकि वे उच्च विद्यालय में चले जाएं। उसके आगे प्लस टू व उच्च शिक्षा ग्रहण कर सकें। तभी शिक्षा का स्तर बढ़ेगा। बाल मजदूरी से भी मुक्ति मिलेगी। अब जबकि मुजफ्फरपुर आकांक्षी जिला में शामिल है, यहां स्मार्ट क्लासेज के कार्यक्रम तैयार किए जाएं।

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