मधुबनी के इस स्वास्थ्य केंद्र पर हर समय रहता दलालों का पहरा, कंगाल हो रहे मरीज

इलाज के दौरान बनने वाले बिल का 40 से 50 फीसद इन दलालों के बीच बंटता है। फोटो: जागरण

इलाज को पहुंचने वालों को बरगलाकर निजी नर्सिंग होम में भर्ती होने का पड़ता दबाव। लोग अस्पताल प्रशासन की जानकारी में पूरा खेल चलने का लगा रहे आरोप। आम जनता के पैसे से वेतन पाने वाले सरकारी स्वास्थ्य कर्मी निजी नर्सिंग होम व जांच केंद्रों के एजेंट बने बैठे हैं।

Publish Date:Wed, 02 Dec 2020 09:37 AM (IST) Author: Ajit Kumar

मधुबनी, जेएनएन। गरीब और निस्सहाय लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना की गई। लेकिन, विभागीय उदासीनता और भ्रष्टाचार के बोलबाला के कारण यही केंद्र आज गरीबों को कंगाल करने में जुटी हुई है। आम जनता के पैसे से वेतन पाने वाले सरकारी स्वास्थ्य कर्मी निजी नर्सिंग होम व जांच केंद्रों के एजेंट बने बैठे हैं। इसकी बानगी देखनी हो तो मधुबनी जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, घोघरडीहा का भ्रमण कर लीजिए। यहां 24 घंटे दलालों की सक्रियता बनी रहती है। स्वास्थ्य केंद्र के अधिकारी से लेकर कर्मी तक पूरे खेल से वाकिफ हैं, लेकिन उनकी चुप्पी इस खेल में उनकी सहभागिता की गवाही देते हैं। 

चलते हैं अस्पताल को, पहुंच जाते निजी क्लीनिक

प्रखंड क्षेत्र के दूरदराज ग्रामीण इलाकों से मरीज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में बेहतर इलाज व सुविधाओं की उम्मीद लगाए आते हैं। यह स्वास्थ्य केंद्र उनके लिए किसी बड़े अस्पताल से कम मायने नहीं रखता। लेकिन, मरीज के यहां पहुंचते ही पूरा तंत्र सक्रिय हो जाता है। अस्पताल से उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाता है और दलाल उन्हें झांसा देकर निजी क्लिनिकों व जांच केंद्रों तक पहुंचा कर उनसे मोटी उगाही करते हैं।

कर्मी मिले ना मिले, दलाल जरूर मिलेंगे

स्वास्थ्य केंद्र की हालत यह है कि यहां रोस्टर के अनुसार कर्मी मिले या ना मिले, दलाल हर वक्त मिल जाएंगे। अंतर्वासी एवं प्रसव कक्ष के इर्द-गिर्द 24 घंटे इनकी मौजूदगी बनी रहती है। अक्सर इन दलालों को स्वास्थ्य कर्मियों के साथ बैठक करते भी देखा जाता है।

कमीशन का है पूरा खेल

पूरा खेल कमीशन का है। इसके चक्कर में मरीजों को संसाधन, विशेषज्ञ चिकित्सक व सुविधा की कमी का हवाला देकर रेफर कर दिया जाता है। इन सब के बीच दलाल मरीज व उनके स्वजनों की हरेक गतिविधि पर पैनी नजर रखते हैं। अस्पताल पहुंचने के साथ ही वे उनके संपर्क में आ जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि रेफर होने के तुरंत बाद सस्ते इलाज के नाम पर उन्हें बरगलाकर निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया जाता है। इलाज के दौरान बनने वाले बिल का 40 से 50 फीसद इन दलालों के बीच बंटता है।

मरीजों से होती वसूली

यदि कोई मरीज अस्पताल में रुक भी गया तो उनसे स्वास्थ्य कर्मी वसूली करते हैं। प्रसव के बाद बेटा हो या बेटी, दोनों के लिए एएनएम, ममता व अन्य कर्मियों के शुल्क निर्धारित हैं। कई बार स्वजनों ने इसकी शिकायत भी की। स्वास्थ्य प्रबंधक ने एक बार जांच में शिकायत सही पाया तो प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी ने संबंधित कर्मी के प्रसव कक्ष से ड्यूटी से हटा दिया। बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।

क्या कहते हैं अधिकारी

स्वास्थ्य प्रंबधक जयनन्दन कुमार इन आरोपों को स्वीकार नहीं करते, लेकिन यह भी कहा कि इन सब बातों को लेकर उच्चाधिकारी को पत्र भेजा गया है। कहा कि प्रसव कक्ष में किसी बाहरी का प्रवेश ना हो, इसके लिए गार्ड को सख्त हिदायत दी गई है।  

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