आब जेकरा पास धनबल-बाहुबल छै, वही जितैय छै पंचायत चुनाव

मुंगेर । इस समय गांव में पंचायत चुनाव की हवा बह रही है। कोई आज के जमाने की तो कोई पुरा

JagranTue, 21 Sep 2021 06:30 PM (IST)
आब जेकरा पास धनबल-बाहुबल छै, वही जितैय छै पंचायत चुनाव

मुंगेर । इस समय गांव में पंचायत चुनाव की हवा बह रही है। कोई आज के जमाने की तो कोई पुराने जमाने में हुए चुनाव की पूरी व्याख्या बताने में मशगूल हैं। चौपाल पर चुनाव की ही चर्चा हो रही है। मंगलवार की दोपहर 11 बजे चुके हैं। भगत काका, चलितर बाबू, अरविद दास और सिकंदर महतों काका और धनेश्वर बाबू गमछा बिछाये लेटे हुए हैं। गोर लागी छी दादा..कहकर हम उनके बगल में बैठ गए। हमें देख उठकर बैठते हुए भगत काका बोल पड़े-की नुनु! अबकी गांव में चुनाव के..की माहौल की छियै ? केकर जीतै के चांस छौ..। मैं कुछ बोलता इससे पहले भगत बाबू बोले कोय जीतै अपना लैय..। पांच साल में राजा बनैलै..। तभी अरविद दास हाथ झाड़ते हुए बोले-कौन जीतेगा..इसका क्या मतलब दादा..। जिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत सुने हो ना..। पुरनका जमाना वाला अब चुनाव थोड़े है। जिसके पास धनबल-बाहुबल होगा वहीं नऽ चुनाव जितेगा। सहीये कहैय छो..। अब यहां नाम न खुले इसका भी ख्याल रखते हुए काका ने चर्चा का रूख मोड़ने का प्रयास किया। पुराना जमाना में सत्तू-चूड़ा खायके दिनभर मुखिया के प्रचार में भिड़ल रहैय छलौ..। तभी भगत काका ने दिमाग पर जोर देते हुए और अपने शरीर से निकल रहे पसीना को पोंछते हुए कहा- देश में पहला पंचायती चुनाव 1952 में हुआ था। ---------------------------------------- ..1978 के बाद मुंहबोला मुखिया होते थे 1978 के बाद पंचायती चुनाव पर प्रतिबंध लगा दिया गया। प्रतिबंध के बाद मुंहबोला मुखिया जी हुआ करते थे। इतना कह वे चुप हो गये। चुनाव के बारे में जानने की इच्छा और अधिक बढ़ गई। हमने कहा-कुछ और बताइये ना दादाजी..। तब अपने पाकेट में हाथ डालते हुए वे बोले-शायद 1993 से फिर बिहार में पंचायती चुनाव शुरू हुआ। 1998 से निर्वाचन आयोग ने प्रत्याशियों पर शिकंजा कसना शुरू किया। और अब काफी हद तक बिना हिसा के चुनाव हो रहे हैं। इतना कह हांफते हुए वे सामने बिक रही सब्जी खरीदने चए गए। अब चर्चा बंद होने वाली थी, तभी चरितर बाबू ने पुरानी बातों की छौंक लगाई। कहा- ई तऽ हेमजापुर के स्व. उपेन्द्र प्रसाद वर्मा (तत्कालीन पंचायती राज मंत्री) जी भी निर्वाचन आयोग कैय पत्र लिख कैय बिहार में चुनाव कराबै कैय मांग करलै छलैय.। उनकी बात पूरी भी नहीं हुई कि एक प्रत्याशी को अपनी ओर आते देख सभी वहां से उठ गए और अपने-अपने घरों की ओर जाने को मुड़ गए।

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