कैमूर में यास चक्रवात ने किसानों की तोड़ी कमर

कभी प्रकृति की मार तो कभी कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन की मार से भटौली गांव के ग्रामीण त्रस्त हैं।

JagranMon, 31 May 2021 05:13 PM (IST)
कैमूर में यास चक्रवात ने किसानों की तोड़ी कमर

कैमूर। कभी प्रकृति की मार तो कभी कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन की मार से भटौली गांव के ग्रामीण त्रस्त हैं। जिस सब्जी की खेती से यहां के लोग समृद्धशाली हो रहे थे अब वे लोग दो वर्षों से प्रकृति की मार से बेजार हो गए हैं। तकरीबन सौ एकड़ से अधिक खेतों में लगी सब्जी की फसल यास तूफान के आने से तहस नहस हो गई है। तरबूज खरबूज की तो ऐसी स्थिति हो गई है कि खेतों में लगे फल सड़ कर नष्ट हो गए हैं। दैतरा बाबा स्थान के समीप मोहनियां बक्सर पथ पर एक सप्ताह पहले गुलजार रहने वाली मंडी अब वीरान हो गई है।

बेमौसम सब्जी के फसलों पर यास के प्रकोप पड़ने से किसान माथे पर हाथ धरकर किस्मत का रोना रो रहे हैं। तकरीबन एक करोड़ की सब्जी व तरबूज खरबूज भटौली के किसानों के नष्ट होने की बात बताई जा रही है। जिसकी भरपाई दो चार वर्षों में भी नहीं हो सकने की बात बताई जा रही है। महंगे दाम पर मालगुजारी देकर खेतों में सब्जी की फसलों को लगाकर इलाके में सब्जी की खेती में मिसाल कायम करने वाले भटौली के किसानों पर इन दिनों मुसीबत की मार पड़ गई है। नेनुआ, लौकी, करैला, परवर, भिडी, बैगन, खीरा आदि सब्जी की फसलें पूरे गर्मी से लेकर आषाढ़ माह तक निकलती थी। जिससे सस्ता सब्जी बाजारों में उपलब्ध हो जाती थी। लेकिन अब सब्जी की महंगाई की मार लोगों पर पड़ने लगी है। पांच दिन पहले बाजार में बिकने वाली सब्जी नेनुआ, लौकी, करैला, भिडी, की कीमत दो से चार रुपए किलो मिलती थी। लेकिन अब 25 से 30 रुपए किलो सब्जी बिकने लगी है। भटौली के किसान रजिद्र चौधरी, संजय कुशवाहा, बिग्गु कुशवाहा, चुन्नू कुशवाहा, महेंद्र कुशवाहा, रामदुलार पासवान, धर्मदेव चौधरी, रामअशीष पासवान आदि ने बताया कि पिछले वर्ष कोरोना के चलते लॉकडाउन होने के कारण सब्जी बाहर नहीं जा सकी। लेकिन सब्जी पर प्रकृति की मार नहीं पड़ने से पूंजी बरकरार थी। लेकिन इस बार तो लॉकडाउन के साथ साथ यास तूफान से सारी सब्जी की फसलें नष्ट हो गई है। तरबूज खरबूज का तो और खराब हाल है। इसी तरह की स्थिति बनी रही तो हम जैसे किसान सब्जी की खेती से मुंह मोड़ने पर मजबूर होंगे।

सरकार द्वारा अभ तक नहीं मिली कोई सहायता

इन किसानों को केवल अनुदान के लिए आश्वासन ही मिला है। अंसी व डहरक मौजा के 100 एकड़ के खेतों में यहां के किसान सब्जी की खेती करते हैं। करीब तीस वर्ष से अधिक समय से यहां के किसान हाड़तोड़ मेहनत कर इस बंजर भूमि पर सोना उपजा दिए। लेकिन इन किसानों को अभी तक अनुदान व किसी तरह की सहायता नहीं मिल सकी है।

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