कैमूर में गेहूं के पटवन के बाद नहर में आया पानी

कैमूर में गेहूं के पटवन के बाद नहर में आया पानी

जिस समय गेहूं की फसल को पानी की जरूरत थी तब नहरों में पानी नहीं आया।

JagranMon, 01 Mar 2021 07:01 AM (IST)

गया। जिस समय गेहूं की फसल को पानी की जरूरत थी तब नहरों में पानी नहीं आया। सिचाई विभाग को किसानों की चिता नहीं थी। दो माह तक किसान पानी का इंतजार करते करते थक गए। इसके बाद निजी संसाधनों से गेहूं की सिचाई किए। अब फसल में बालियां लग गई हैं। दलहन और तेलहन की फसल के पटवन का समय समाप्त हो चुका है। मौसम अच्छा रहा तो 15 से 20 दिनों में अधिकतर किसानों के सरसों की फसल की कटनी शुरू होगी। ऐसे में नहर के पानी से नुकसान छोड़ फायदा नजर नहीं आ रहा है। कई जगह नहर क्षतिग्रस्त है। जिससे पानी खेतों में जमा होगा। तब किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मोहनियां प्रखंड में एनएच 30 से पूरब दो माइनर वर्षों से अधूरी पड़ी है। जिसके पानी से करीब एक दर्जन से अधिक गांव के किसानों की फसल बर्बाद होती है। इस नहर का पानी मामादेव, कठेज, अमेठ, घेघियां, भरखर इत्यादि गांव के बधार में लगी फसल को बर्बाद करते हुए रेलवे लाइन के चाट से दक्षिण कुर्रा, अकोढ़ी, मुबारकपुर गांव के बधार में पहुंचता है। अकोढ़ी गांव से उत्तर रेलवे लाइन में बने पुल में अवरोध के कारण पानी की निकासी नहीं होती। इस कारण अकोढ़ी गांव के पधार में नहर का पानी जमा होता है। इससे सैकड़ों एकड़ में लगी रबी फसल डूब जाती है। इस पानी से उक्त गांव के किसानों के धान की फसल भी बर्बाद होती है। यह समस्या कई वर्षों से कायम है। इसके समाधान के लिए किसान जन प्रतिनिधियों व पदाधिकारियों के यहां गुहार लगाकर थक चुके हैं। लेकिन अभी तक इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। वर्ष 2017 में तत्कालीन डीएम राजेश्वर प्रसाद सिंह ने मोहनियां व रामगढ़ के तत्कालीन विधायकों व अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ अकोढ़ी गांव के बधार में जलजमाव की समस्या को देखा था। इसके निदान की दिशा में पहल का आश्वासन दिया था। जन प्रतिनिधियों से भी सुझाव मांगा था। मोहनियां के एसडीएम व सीओ को समस्या के निदान का निर्देश दिया था। लेकिन उनका प्रयास कारगर नहीं हो पाया। जलजमाव से अगर रबी की फसल भी बर्बाद होती है तो किसानों को दोहरा नुकसान होगा, इसकी आशंका से किसान चितित हैं। किसानों का कहना है की सिचाई विभाग पटवन का समय निकल जाने के बाद जगता है। ऐसे में किसानों को दोहरा नुकसान होता है।

जिन किसानों के पास पटवन का अपना साधन नहीं है वे पहले पानी खरीद कर गेहूं का पटवन किए। उसमें पैसा खर्च हुआ। अब हर के पानी से डूबकर फसल बर्बाद होगी।

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