तुलसी के साहित्य का उद्देश्य स्वात: सुखाय था : कुलपति

गया मगध विश्वविद्यालय के हिन्दी स्नातकोत्तर विभाग के द्वारा आयोजित तुलसीदास और उनका भारत-बोध विषयक एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब गोष्ठी संपन्न हुई।

JagranSat, 21 Aug 2021 11:47 PM (IST)
तुलसी के साहित्य का उद्देश्य स्वात: सुखाय था : कुलपति

गया : मगध विश्वविद्यालय के हिन्दी स्नातकोत्तर विभाग के द्वारा आयोजित तुलसीदास और उनका भारत-बोध विषयक एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब गोष्ठी संपन्न हुई। कार्यक्रम के आरंभ में डा. सुनैना कुमारी द्वारा सुमधुर सरस्वती वंदना नमो शारदा माता की प्रस्तुति दी गई। मंचासीन अतिथियों और उपस्थित सभी सहभागियों का स्वागत और परिचय मविवि हिन्दी स्नातकोत्तर के अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार ने किया। उन्होंने बताया कि तुलसी के काव्य के बिना हिन्दी साहित्य का स्वर्णकाल अपनी स्वर्णिम आभा खो देगा। मविवि कुलपति प्रो. राजेंद्र प्रसाद को विश्व हिन्दी परिषद की ओर से सम्मानित करने का निर्णय लिया गया है।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि तुलसी के साहित्य का उद्देश्य स्वांत: सुखाय था, किसी राज्याश्रय में रहकर रचना करना नहीं। उन्होंने अपने निजी जीवन से उदाहरण देते हुए बताया कि रामचरितमानस जैसे ग्रन्थों में जीवन का संबल मिलता है। संत परंपरा के महान भक्त साधक ने भक्ति के माध्यम से शक्ति साधना की। ऐसे नायक की स्थापना की जो बालकांड से लेकर उत्तरकांड तक जन-जीवन को प्रेरणा देते रहे हैं। पराधीनता के भाव निर्मूल करने में भारतीय धार्मिक-आध्यात्मिक ग्रन्थों का अमूल्य योगदान रहा है। हमारी भविष्य की पीढ़ी को इनसे निश्चय ही प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए।

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विद्यार्थी अपने मुकाम पर पहुंचते है तो शिक्षक होता है सफल

-कार्यक्रम की मुख्य अतिथि वैदिक संस्कृति सैंक्चुअरी ग्लोबल न्यूयार्क के निदेशिका डा. कविता वाचक्नवी ने विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि जब विद्यार्थी आगे बढ़ जाता है, तो शिक्षक सफल होता है। विहंगावलोकन करते हुए भारत से बाहर रहते हुए कई बातें नए अर्थों में खुलती हैं।

कार्यक्रम का संचालन और समन्वयन मविवि सहायक आचार्यों डॉ. परम प्रकाश राय और डॉ. अजित सिंह ने किया। आभार ज्ञापन डॉ. अम्बे कुमारी ने किया। हिन्दी विभाग के ही वरीय आचार्यों प्रो. विनोद कुमार सिंह, प्रो. भारत सिंह, प्रो. सुनील कुमार, प्रो. ब्रजेश कुमार राय तथा सहायक आचार्य डा. राकेश कुमार रंजन ने भी कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता की। इसके अलावा राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक आदि से भी कई विद्वान और श्रोता शामिल थे।

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