इन विदेशी मेहमानों को भाया इंडिया, माना- लाल महावर सा गहरा यहां का स्नेहिल समाज

गया [अश्विनी]। पढ़े-लिखे समाज से देश में गाहे-बगाहे असहिष्णुता के कुछ सवाल रह-रहकर भले ही उछलते रहें, पर गांव-जवार की झोपडिय़ों में इसी देश के 'निपढ़' लोगों के बीच वे सिरे से स्वत: खारिज नजर आते हैं, जब वहां अपनत्व के हजार रंगों में सामाजिक स्नेह अपनी छाप छोड़ रहा होता है। यहां आकर विदेशी युवतियां भी पांव में महावर व हाथों में मेंहदी रचाकर इस रंग में ढल जाती हैं और यह सवाल करती हैं, 'व्हाट इज द सीक्रेट ऑफ ऑफ हैप्पीनेस हियर इवन दे आर फेसिंग प्रॉब्लम्स?' (मुश्किलों के बीच भी यहां के लोगों की इस खुशी का राज क्या है)।

ज्ञान की भूमि पर संस्कृति से साक्षात्कार
ज्ञान की भूमि बोधगया में स्पेन व जर्मनी से आए छात्र-छात्राओं के दल ने जब भारत की संस्कृति से साक्षात्कार किया तो उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया यहां के अलमस्त जीवन ने। छठवीं में पढऩे वाली 11 साल की इरेना कहती हैं, मैं यहां खुद को काफी फ्री महसूस कर रही हूं, लोग कितने बेफिक्र हैं, नो टेंशन।

आंखों में बसाकर ले जा रहीं प्रकृति व गंवई अंदाज
जोआपो व लारा पर तो यहां का रंग ऐसा चढ़ा कि उन्‍होंने पांव में महावर व हाथों पर मेंहदी लगवा ली। दोनों फाइन आर्ट एंड डिजाइनिंग की छात्राएं हैं। यहां की प्रकृति व गंवई अंदाज को आंखों में बसाकर ले जा रही हैं, जिसे अपनी डिजाइनिंग में भी उतारेंगी। दोनों ने साडिय़ांं भी खरीदी हैं। वे कहती हैं, यह बहुत फब रहा है, स्पेन में भी पहनकर सहेलियों को दिखाऊंगी।

यहां आकर गांधी को जाना,योग ने भी किया प्रभावित
टोसे आर्किटेक्ट के छात्र हैं। साल्पादोर इंटरनेशनल रिलेनशिप की पढ़ाई कर रहे है। इन्होंने यहां आकर गांधी को जाना है। भारतीय योग ने इन्हें काफी प्रभावित किया। सोफिया व मारिया कहती हैं, हमने यहां के गांवों को देखा। इस बात ने बहुत प्रभावित किया कि कच्चे मकान व झोपडिय़ों में भी लोग कितने खुश हैं। यहां के आतिथ्य-सत्कार की परंपरा ने दिल जीत लिया। गांवों की महिलाओं ने सिर पर हाथ फेरे तो एक आत्मिक स्नेह का अहसास हुआ। बताया कि हमारे उम्र की लड़कियों ने जब प्यार से मेंहदी रचाई तो वह दिल के किसी कोने को छू रहा था।

कहा, जाते वक्त छलकेंगी आंखें
टोसे, पिलर, मिगेल, ड्राबिएल में कोई मैनेजमेंट तो कोई मेडिकल साइंस या मैनेजमेंट एंड लॉ की पढ़ाई कर रहा है। स्पेनिश युवतियों को गांवों में दरवाजे पर बंधी गायें, महिलाओं का घूंघट की ओट से झांकना, चूड़ी-बिंदी बहुत पसंद आई। इतना ही नहीं, इन्होंने क्षेत्रीय मगही भाषा की फिल्म भी देखी और यहां की सांस्कृतिक विरासत को समझने की कोशिश की। वे कहते हैं, हमें महसूस ही नहीं हुआ कि हम दूसरे देश में हैं। जाते वक्त आंखें छलकेंगी। हम फिर आएंगे। छोटी-सी बच्ची इरेना कहती है-स्पेन के बाद मेरा दूसरा देश भारत है। आइ लव इंडिया!

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