शहरनामा गया

दौरे अनेक, कार्य कछुआ चाल से

पितृपक्ष मेले की तैयारी महीनों से हो रही है पर जमीन पर अभी तक कुछ नजर नहीं आ रहा है। न शहर की सफाई हो पाई और न ही पिंडवेदियों को सुसज्जित करने का ही कार्य पूरा हो सका है। पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य व अन्य मूलभूत सुविधाओं से भी मेला क्षेत्र को संपन्न नहीं किया गया है। प्रशासन की व्यवस्था को देखकर स्थानीय लोग भी सोच में पड़ गए हैं। शहर में यही चर्चा हो रही है कि पितृपक्ष मेले को लेकर कई महीने से हो रही बैठकों का मेला क्षेत्र में कोई असर तो नहीं दिख रहा है। एक के बाद एक अधिकारी और मंत्री दौरा कर रहे हैं। इतना ही नहीं दिशा-निर्देश देने में भी कोई कमी नहीं है पर निर्माण कार्य की गति को देखकर लगता नहीं है कि देश-विदेश से आने वाले पिंडदानी अच्छा संदेश लेकर जाएंगे। एक चौक पर चाय की चुस्की ले रहे एक बुजर्ग ने कहा, यह गयाजी है। यहां लोग पिंडदान करने आते हैं। उन्हें चमक-धमक से कोई मतलब नहीं है। पितरों को पिंडदान देंगे और फिर खुशी-खुशी लौट जाएंगे। यह सब जो प्रशासन की ओर से तैयारी चल रही है उसका लाभ तो शहरवासी ही उठाएंगे। इसलिए इस तरह की तैयारी वर्षभर चलनी चाहिए ताकि 'भोज के दिन कोहड़ा' की कहावत चरितार्थ न हो।

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'देखो मगर प्यार से..'

गया शहर यूं तो नगर निगम बन गया है, परंतु बाजार में प्रवेश करने से पहले लोग सोच में पड़ जाते हैं। न जाने किस मोड़ पर उन्हें घटों जाम में फंसना पड़ जाए। एक तो अतिक्रमण के कारण दिनोंदिन बाजार की अधिकाश सड़कें सिकुड़ती जा रही हैं, वहीं दूजा सड़कों पर ही वाहन खड़ी करने की आदत ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। इससे जाम की समस्या उत्पन्न हो गई है। बताते चलें कि किरानी घाट, बागेश्वरी गुमती, रेलवे स्टेशन रोड, स्वाराजपुरी रोड, गेवाल बिगहा मोड़, गया कॉलेज, बाइपास, मानपुर के मुफ्फसिल मोड़ आदि जगहों पर एक किमी की दूरी तय करने में घंटों लग जाते हैं। वैसे भी लोग अब आदी हो चुके हैं। चलिये, घर से निकलने के बाद मेले का आनंद लीजिए। इसी मेले के लिए आप रुपये देकर टिकट खरीदते हैं, लेकिन गया की सड़कों पर मुफ्त में मेले का आनंद उठाते रहिए।

'देखो मगर प्यार से..',

'किस्मत तेरी दासी है, घर में मथुरा काशी है..' जैसी शायरी मुफ्त में पढ़ने को मिल रही है तो फिर घर जाने की जल्दी किसी बात की? बस आप अगले वाहनों के पीछे तरह-तरह की लिखी शायरी पढ़ते रहिये, दूरी अपने आप मिट जाएगी।

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