पावरलूम की खट-खट के बीच हर वर्ष निकल रहे होनहार, गया की मानपुर के कई बच्‍चे JEE में सफल

सरकार से निबंधित 882 पावर लूम इकाई में नौ हजार पावरलूम संचालित किए जा रहे हैं। पटवा टोली में विभिन्न तरह के वस्त्र बनाने में लगे हैं करीब 45 हजार बुनकर। हर वर्ष आइआइटी में जा रहे हैं यहां के बच्‍चे।

Vyas ChandraMon, 18 Oct 2021 07:34 AM (IST)
गया के मानपुर में तैयार हो रहा वस्‍त्र। जागरण

मानपुर (गया), जागरण संवाददाता।  गया जिले के मानपुर की पटवाटोली उद्योग नगरी के रूप में प्रसिद्ध् है। लेकिन यहां से केवल अच्‍छे कपड़े ही नहीं बल्कि होनहार भी निकलते हैं। देश की कठिनतम परीक्षाओं में सफल होकर यहां के छात्रों ने इस पटवा टोली की पहचान अब होनहारों की टोली के रूप में बनानी शुरू कर दी है। यहां की मिट्टी से पिछले एक दशक में कई आइआइटियन निकले हैं। लगन और परिश्रम से इन लोगों ने एक नई इबारत लिखनी शुरू कर दी है। कोई ऐसा वर्ष नहीं है, जब जेईई के मेन और एडवांस की परीक्षा में यहां छात्र सफल नहीं होते हैं। इनका एक अलग जलवा है।

दिन में पावरलूम और रात में पढ़ाई

पढ़ाई के साथ-साथ माता-पिता को पावरलूम में मदद भी करते हैं। यहां 10 दशक पूर्व की अपेक्षा उद्योग नगरी पटवा टोली में काफी बदलाव आया। बिहार ही नहीं दूसरे प्रदेश के लोगों के पसंद लायक वस्त्र यहां बनने लगे।  कम कीमत में बेहतरीन डिजाइन मिलने के वजह बंगाल में काफी मांग होने लगी। बिक्री होते ही उत्पादन बढ़ गया। बुनकर मजदूर को भी रोजगार मिलना शुरू हो गया। आज पटवा टोली में सरकार से निबंधित 882 पावर लूम इकाई है। उक्त इकाई में करीब नौ हजार पावर लूम संचालित है। ट्रक से उतार कर धागा को गोदाम तक लाने , ताना-बाना करने से लेकर लूम पर विभिन्न तरह के वस्त्र बनाने , सरियाने, वस्त्र को ठेला से गोदाम तक पहुंचाने एवं दूसरे प्रदेश में भेजने के लिए ट्रक पर लोड करने से करीब 45 हजार बुनकर मजदूर लगे हैं।

सरकार के अनुदान से बदली सूरत

पटवा टोली में विभिन्न तरह के वस्त्र बनाने के लिए पहले सदा धागा आता था। प्लेन मशीन पर सदा गमछा एवं सदा थान तैयार होते थे। जिसका उत्पादन और बिक्री कम होती थी। बुनकरों की आमदनी काफी कम होती थी। तब वस्त्र उद्योग के प्रति बुनकरों का ध्यान कम होने लगा। वे इस धंधे को छोड़ने का मूड बनाने बनाने लगे। तब जाकर सरकार ने बुनकरों को अनुदान दिया। उससे पावर लूम खरीदा गया। उक्त पावर लूम ने तो फिर यहां की सूरत और सीरत दोनों बदल गई। उत्‍पादन और बिक्री बढ़ने से बुनकरों की तकदीर भी बदल गई।  

कई राज्‍यों में होती है वस्‍त्रों की सप्‍लाई  

पंजाब के धागा से गया में वस्‍त्रों का निर्माण होता है। प्रतिदिन दो ट्रक धागा पंजाब एवं तमिलनाडु से मंगाया जाता है। रंगीन गमछा, रजाई, तोशक के खोल का कपड़ा तैयार होता है। इसकी बिक्री बिहार के अलावा झारखंड्, असम, बंगाल में होती है। पटवा टोली से प्रतिदिन एक ट्रक गमछा बंगाल भेजा जाता है। इसके अलावा भी कई जगहों पर गमछा, रजाई, तोशक के खोल के कपड़े की थान भेजी जाती है। श्रीदुर्गाजी पटवाय जाति‍ सुधार समिति के पूर्व सभापति जितेन्द्र पटवा, पूर्व सलाहकार बंगाली पटवा का कहना है कि बच्चों की सफलता के पीछे खुद की मेहनत और गरीबी है। बच्चे गरीबी के बीच पले हैं। दिन में बच्चे पावरलूम में काम करते हैं, रात में खुद पढ़ाई करते हैं। पिछले एक दशक से ज्यादा पटवाटोली ने आइआइटियन दिए हैं। 

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