नवादा: ओल की खेती कर तकदीर बदलने की कवायद में जुटे हैं किसान, जानें ओल की खेती के फायदे

जिले के विभिन्न प्रखंड के चयनित 30 किसानों को ओलहल्दी अदरक एवं मसाले का प्रशिक्षण दिलवाया गया था। हिसुआ में करीब डेढ़ दर्जन किसान ओल की खेती कर रहे हैं। उन्नत प्रभेद के बीज के लिए समस्तीपुर जिले के पूसा एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय से संपर्क में रहते हैं।

Sumita JaiswalMon, 21 Jun 2021 11:38 AM (IST)
हिसुआ प्रखंड के प्रखंड के सिहीन गांव के किसान कर रहे ओल की खेती, सांकेतिक तस्‍वीर ।

हिसुआ (नवादा), जागरण संवाददाता। प्रखंड के सिहीन गांव के किसान इन दिनों ओल की खेती की ओर आकर्षित हुए हैं। आर्थिक समृद्धि के लिए किसान तेजी से इस खेती को अपना रहे हैं। करीब डेढ़ दर्जन किसान पिछले दो वर्षों से इस खेती को अपना चुके हैं। पिछले साल की अपेक्षा इस साल किसानों की संख्या में वृद्धि हुई है।

 खेती से जुड़े ग्रामीण मोसाफिर कुशवाहा कहते हैं कि दो वर्षों से इसकी खेती से गांव के कई किसान जुड़ चुके हैं। खेती से जुडऩे वाले कई किसान प्रशिक्षित हैं। उन्नत प्रभेद के बीज के लिए समस्तीपुर जिले के पूसा एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय से संपर्क में रहते हैं। वहां से बीज उपलब्ध भी हुआ है। गत वर्ष सितम्बर में ओल को लगाया गया था। जुलाई के अंतिम सप्ताह या अगस्त माह के पहले सप्ताह में उखाड़ा जाएगा। सितम्बर माह में खेत की जोताई कर पुन: उसमें बीज डाल दिया जाएगा। हालांकि, बाजार उपलब्ध नहीं रहने से किसानों को कम कीमत पर अपने उत्पाद को लोकल मार्केट में बेचना पड़ता है, जिससे किसानों को मुनाफा थोड़ा कम होता है।

अच्छी होती है पैदावार

खेती से जुड़े किसानों की मानें तो एक कठ्ठा खेत में 12-14 मन ओल की पैदावार होती है। एक कठ्ठा ओल की खेती करने में तकरीबन 2500- 3000 रुपये खर्च आता है। आमदनी किसानों को करीब 8000-10000 रुपये की होती है। स्थानीय स्तर पर बाजार उपलब्ध हो तो किसानों को और लाभ मिल सकता था। ओल की फसल करीब एक साल में तैयार हो जाती है।

किसी तरह का नहीं मिलता अनुदान

  सिहीन गांव के ओल उत्पादक किसानों ने कहा कि ओल की खेती को बढावा देने के लिए सरकार द्वारा किसी प्रकार का अनुदान नहीं दिया जाता है। बीज खरीदने में भी कोई छूट सरकार से  नहीं मिलती है। ओल की खेती के लिए जमीन का सतह उभरा होना चाहिए। खेतों में जल जमाव नहीं हो। यदि खेतों में पानी जमा होगा तो ओल का बीज सड़ जाएगा। जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। सिहीन गांव के ओल उत्पादक किसानों ने कहा कि की ओल की खेती के बढ़ावा देने के लिए  अनुदान और स्थानीय स्तर पर बाजार उपलब्ध कराने की व्यवस्था सरकार को करने की आवश्यकता है। गांव में 5 एकड़ जमीन में ओल लगाया गया है।

आत्मा के द्वारा दिलाया गया था प्रशिक्षण

जिले के विभिन्न प्रखंड के चयनित 30 किसानों को ओल,हल्दी, अदरक एवं मसाले का प्रशिक्षण दिलवाया गया था। सिंघौली गांव के किसान मनोज सिंधु ने बताया कि हिसुआ प्रखंड से मोसाफिर कुशवाहा, उमेश चौरसिया, मंजु देवी, अकबरपुर प्रखंड से बकसंडा निवासी कामेच्छा महतो, कृष्णा सिंह,  नारदीगंज प्रखंड के परमा निवासी रामपति देवी, माला देवी सहित 30 किसान को आत्मा की ओर पूसा एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय समस्तीपुर,  बिरसा मुंडा एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय रांची एवं एक सप्ताह के लिए लखनऊ कृषि अनुसंधान केंद्र में प्रशिक्षण के लिए ले जाया गया था। प्रशिक्षण के दौरान कृषि विभाग के पदाधिकारी अविनाश कुमार, अवधेश कुमार, राजु कुमार एवं यादवेन्द्र प्रसाद सिंह मौजूद थे।

कम लागत पर अच्छी आमदनी

  खेती से जुड़ मोसाफिर कुशवाहा ने बताया कि ओल साल में एक फसल वाला खेती है। एक कठ्ठा में अधिक से अधिक दो मन धान एवं एक से डेढ मन गेहूं की फसल प्राप्त होती है। कुल मिलाकर एक वर्ष में 2000-2500 रुपये का फसल होता है। धान और गेहूं उत्पादन में लागत के साथ-साथ परेशानी भी अधिक होती है। जबकि एक कठ्ठा ओल लगाने पर कम से कम 10 मन ओल की पैदावार हो जाता है। 20 रुपये प्रति किलो के भाव में भी बिकता है तो एक कठ्ठा में 8000 रुपये का फसल प्राप्त होता है। ओल की खेती में लागत के साथ-साथ परिश्रम भी कम करना पड़ता हैं। जो कुछ परिश्रम लगाने के समय ही करना पड़ता हैं। वर्षा ऋतु के आगमन के पूर्व खरपतवार निकाल कर दवाई का छिड़काव होता है ताकि वर्षा से फसल को नुक्सान नहीं पहुंचे।

क्या कहते हैं अधिकारी

हिसुआ के प्रखंड कृषि पदाधिकारी माणिक चंद ने बताया कि ओल,अदरक,हल्दी एवं मसाले के खेती का प्रशिक्षण आत्मा द्वारा जिले के कुछ चयनित किसानों को सरकारी खर्च पर देश के कृषि विश्वविद्यालय में दिलवाया जाता है, ताकि किसान नगदी फसल की खेती कर अपना रहन सहन के स्तर में बदलाव कर सके। अभी सिर्फ धान के बीज पर ही अनुदान देने का प्रावधान है।

 

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